भगवान के दर पर अर्जी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना से बचाव के लिए टीका लगवा लिया। 1 मार्च सोमवार को सुबह-सुबह ही खबर आई कि मोदीजी बिना किसी तामझाम और सुरक्षा के सुबह 6 बजकर 25 मिनट पर दिल्ली स्थित एम्स पहुंचे और टीका लगवाया। आश्चर्य है कि देश के प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए नियुक्त कमांडो उस वक्त क्या कर रहे होंगे। क्या साहेब उनके बिना ही पहुंच गए। खैर टीकाकरण के साथ मोदीजी ने अपनी पार्टी का चुनावी प्रचार भी कर लिया। उनके चेहरे की रूपसज्जा तो इस वक्त रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसी ही है, इसके अलावा उन्होंने असमिया गमछा डाला हुआ था और टीका देने का काम केरल और पुड्डुचेरी की नर्सों ने किया। तमिल भाषा न सीख पाने का मलाल वे मन की बात में एक दिन पहले ही कर चुके थे। इस तरह पांचों चुनावी राज्यों के लिए भाजपा सांसद नरेन्द्र मोदी, जो देश के प्रधानमंत्री हैं, ने गूढ़ भाषा में संदेश दे दिया। नया मुहावरा बन सकता है, एक टीका, पांच निशाने। टीका लगवाते वक्त प्रधानमंत्री ने मास्क नहीं पहना था। इससे उनका हंसता-मुस्कुराता चेहरा कैमरे में अच्छे से कैद हुआ। हालांकि वो सुई नहीं दिखाई दी, जो नर्स उनकी बांह में लगा रही थी। वैसे मोदीजी अस्पताल में जिस तरह मुस्कुरा रहे थे, वैसी मुस्कुराहट बिरलों को ही नसीब होती है। अन्यथा देश का आम आदमी को अपनी तकलीफों के साथ अस्पताल पहुंचता है और वहां इलाज से पहले कई और तरह की तकलीफों से दो-चार होता है। मरीज के साथ-साथ उसके परिचारक भी बीमार होने की हद तक परेशान हो जाते हैं। डाक्टर को दिखाने के लिए लंबी लाइन, कभी-कभी हफ्ते या महीने भर बाद मिलने वाले अपाइंटमेंट, बिल भरने, रसीद कटाने की अजीबोगरीब व्यवस्थाएं, दवाओं की लंबी पर्चियां, जिनमें कितने काम की हैं, कितनी जबरदस्ती लिख दी गई हैं, कुछ पता नहीं, अस्पतालों में स्वच्छता के साथ-साथ अन्य सुविधाओं का अभाव या महंगी दर पर उनकी उपलब्धता, ऐसे न जाने कितने बिंदु हैं, जिन पर हरेक नागरिक की अपनी-अपनी पीड़ा छिपी है। रास्ते में रोककर 10 आदमियों से अगर अस्पतालों में होने वाली तकलीफ पर बात की जाए, कम से कम 9 आदमी उन तकलीफों से गुजर चुके होंगे। लेकिन फिर भी स्वास्थ्य सेवा इस देश की प्राथमिकता में शुमार नहीं होता। चरक और सुश्रुत या आयुर्वेद के नाम पर हम कब तक खुद को भ्रम में रखेंगे, जबकि वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं के लिहाज से हम काफी पिछड़े हुए हैं। जनवरी में इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने एशिया-प्रशांत व्यक्तिगत स्वास्थ्य सूची रिपोर्ट जारी की, जिसमें एशिया-प्रशांत के 11 देशों की सूची में भारत 10वें पायदान पर रहा। मोदी सरकार ने आयुष्मान भारत के बाद अब प्रधानमंत्री आत्मनिर्भर स्वस्थ भारत योजना की बात जोर-शोर से की है। हालांकि इस बार के बजट में इस नई स्वास्थ्य योजना के लिए क्या व्यवस्था है, इसका कुछ पता नहीं। सरकार ने एक बार फिर आंकड़ों की हेर-फेर से वाहवाही लूटना चाही है। सरकार का कहना है कि स्वास्थ्य और कल्याण के बजट में पिछले साल की तुलना में इस बार 137 प्रतिशत की बढ़ोतरी की गई है। हकीकत ये है कि स्वास्थ्य के बजट में पेयजल, स्वच्छता, और पोषण के बजट को भी शामिल कर लिया गया है। इस बार आम बजट में स्वास्थ्य के लिए कुल 74,602 करोड़ रुपये आबंटित किए गए हैं। पिछले साल आम बजट में स्वास्थ्य के लिए 67,484 करोड़ रुपए आबंटित किए गए थे, जिसे संशोधित बजट में बढ़ाकर 82,445 करोड़ रुपए कर दिया गया था। चूंकि संशोधित अनुमान आने के बाद उसे ही बजट माना जाता है, इसलिए उससे तुलना करने पर इस साल के स्वास्थ्य बजट में 7,843 करोड़ की कमी आई है। देश में स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन इस सरकार की प्राथमिकता झूठी तारीफें बटोरना है। जिस एम्स में मोदीजी हंसते हुए आराम से चले गए, उस एम्स में कभी वे भेस बदलकर जाएं, तो उन्हें नजर आएगा कि भारत का आम आदमी किस तरह बेहतर और सम्मानपूर्वक इलाज के लिए तरस रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का मानना है कि एक हजार व्यक्तियों पर एक डाक्टर होना चाहिए, लेकिन भारत में ऐसे हालत न जाने कौन से युग में बनेंगे। कम से कम अभी तो न सरकार इस बात को लेकर फिक्रमंद है, न जनता इस पर सरकार से कोई जवाब मांगती है। बीमारी को भाग्य का नाम दे दिया जाता है और भगवान से दुआ करने कहा जाता है। वही माहौल इस वक्त देश में बना है। बीमारी के साथ बेरोजगारी भी अब किस्मत का ही खेल बन चुकी है। कर्मचारी चयन आयोग यानी एसएससी द्वारा अपनाई गई नॉर्मलाईजेशन पॉलिसी युवाओं को भाग्य भरोसे रहना ही सिखा रही है। इस फार्मूले के तहत कई-कई दिनों में होने वाली परीक्षा में मूल्यांकन के दौरान सभी छात्रों के बीच न्याय बरकरार रखने की बात की जाती है। चूंकि एक दिन का पेपर किसी दूसरे दिन लिए गए पेपर से सरल या कठिन हो सकता है इसलिए इस पॉलिसी को अपनाया गया है। इसमें कठिन पेपर वाले छात्रों को कुछ अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं जबकि सरल पेपर वाले छात्रों के कुछ अंक घटाए भी जा सकते हैं। एसएससी की सीजीएल यानी कम्बाइन्ड ग्रेजुएट लेवल एक्जामिनेशन 2019 की टियर-2 परीक्षा में ऐसा ही हुआ, जिसे लेकर छात्र बेहद नाराज हुए और देश में रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की अनियमितताओं को लेकर एक डिजिटल आंदोलन खड़ा हो गया। 21 फरवरी के बाद 25 फरवरी को मोदी रोजगार दो, मोदी जॉब दो के हैशटैग के साथ लाखों ट्वीट्स हुए। लेकिन सरकार पर इस आंदोलन का कितना असर पड़ा ये मन की बात में साफ हो गया। जहां मोदीजी ने इस बारे में एक शब्द नहीं कहा। 2014 में हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा करने वाले अब युवाओं को रोजगार मांगने वाला नहीं देने वाला बनाना चाहते हैं। इसलिए देश में रिक्तियां घटती जा रही हैं। 2012 में एसएससी-सीजीएल की 16119 रिक्तियां थीं जो 2020 में घटकर 6506 रह गई है। इसी तरह बैंकिंग क्षेत्र में जहां 2013 में आईबीपीए पीओ की 21680 रिक्तियां थीं वो 2020 में घटकर 1167 रह गईं। बेरोजगारी के कारण देश में आत्महत्याओं में बढ़ोतरी हुई है। एनसीआरबी  के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक देश में करीब 1 लाख 30 हजार लोगों ने आत्महत्याएं कीं। इनमें से 11 हजार 268 यानी करीब 9 फीसदी आत्महत्याएं रोजगार न मिलने की वजह से या गरीबी या कर्ज में डूबने से हुई। अपनी पहली पारी में देश के युवाओं को शायद कौशलविहीन मानते हुए मोदीजी ने स्किल इंडिया अभियान चलाया था। कौशल विकास योजना के लिए एक मंत्रालय भी बनाया गया था। इस योजना में 2020 तक 1 करोड़ युवाओं को ट्रेनिंग देने की योजना थी। लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव से कुछ महीने पहले तक इस योजना के तहत सिर्फ 34 लाख युवाओं को कौशल मिला और उनमें से सिर्फ 10 लाख को नौकरियां मिलीं। 2019 यानी दूसरी पारी के आते-आते मोदीजी को देश की शिक्षा नीतियों में खामियां खटकने लगीं, शायद इनकी ही वजह से रोजगार नहीं मिल रहा था। तो नई शिक्षा नीति के तहत वोकेशनल कोर्स शुरु होने का पांसा युवाओं की ओर उछाल दिया गया है। सरकार एक के बाद दूसरी बाजीगरी दिखा रही है और जनता उसमें उलझती जा रही है। इस बीच अयोध्या के भव्य राम मंदिर के लिए 21 सौ करोड़ की राशि दान के जरिए जुटाई जा चुकी है। पहले भी कई करोड़ रुपए मंदिर के लिए दान मिल चुके थे। जब मंदिर बन जाएगा, तब दुनिया में इसकी सुंदरता, भव्यता, विशालता के चर्चे होंगे। ये सवाल करना अब मूर्खता है कि अस्पतालों या शैक्षणिक संस्थानों के लिए अगर ऐसे ही मुक्त हस्त से दान दिया जाए या सरकार इसकी पहल करे तो देश से कितनी समस्याएं दूर हो जाएंगी। यहां सवाल अपनी-अपनी प्राथमिकताओं का है। अयोध्या के मंदिर में भक्तगण श्रद्धा से सराबोर होकर पहुंचेंगे। रामलला के दर्शन कर निहाल होंगे। इनके साथ शायद हजारों-लाखों लोग वो भी शामिल होंगे, जो नौकरी चाहते होंगे, बीमारी से मुक्ति चाहते होंगे या अपने लिए सुरक्षा चाहते होंगे। सरकार से उसकी जिम्मेदारियों का हिसाब हमने नहीं मांगा तो भगवान के दर पर ही अर्जी लगानी पड़ेगी।