मन सतरंगी

घड़ी-घडी़ में मनवा मेरा 

मन सतरंगी होता है ,
फूल से रंगों की महफ़िल में
फाग शगुन-सा होता है।
रंगों की बौछारों से अब 
उर चंदन हो जाता है,
सुलग रही श्वांसों में जैसे
गीत भ्रमर गा जाता है ।
रंगों की इस देहरी पर जब
आसमान छा जाता है ,
छिटक रही हो चंद्र रोशनी
मन व्याकुल हो जाता है।
अक्षर-अक्षर नवरस डूबा
साज धुनों पर थिरक रहा,
मन की वायवी लहरों पर
रंग फाग-सा चहक रहा।
आओ हम हिलमिल खेलें
प्रेम,प्यार की बात करें,
लाएं होंठों पर मुस्काने
रंगों की बरसात करें।
घड़ी-घडी़ में मनवा....
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कार्तिकेय त्रिपाठी 'राम'
गांधीनगर इन्दौर (म.प्र.)