असम में बीजेपी की मुश्किलें बढ़ीं

बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) ने बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को छोड़ दिया है। उसने स्पष्ट रूप से कहा है कि उसने बीजेपी के साथ अपने गठबंधन को नवीनीकृत नहीं किया। वैसे बीजेपी ने भी उसके साथ मिलकर चुनाव लड़ना बंद कर दिया था। पिछले काउंसित चुनावों में बीजेपी ने यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल (यूपीपीएल) के साथ गठबंधन किया था। उसके कारण बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद में बीपीएफ की हार हो गई थी। ऐसा पिछले 15 सालों में पहली बार हुआ। वैसे बीपीएफ 40 सीटों वाली परिषद में 17 सीटें पाकर नंबर वन पार्टी बनी रही, पर उसने सत्ता खो दी, क्योंकि यूपीपीएल- बीजेपी गठबंधन को 21 सीटें हासिल हो गई थीं। अब बीपीएफ कांग्रेस के नेतृत्व वाले महागठबंधन का हिस्सा हो गया है। हालांकि, ऐसी अटकलें थीं कि वह असम जनता परिषद-रायजोर दल गठबंधन में शामिल हो सकता है। लेकिन पार्टी ने इन सभी अटकलों पर ठंडा पानी डाला। औपचारिक रूप से कांग्रेस के ग्रैंड अलायंस में शामिल हो गया। उस महागठबंधन में कांग्रेस के साथ बदरुद्दीन अजमल का ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ), सीपीआई, सीपीआई (एम), सीपीआई (एमएल) और आंचलिक गण मंच शामिल है। आंचलिक गण मंच पत्रकार और राज्यसभा सांसद अजीत भुइयां के नेतृत्व में एक नवगठित क्षेत्रीय पार्टी है। इसमें कोई शक नहीं, ग्रैंड अलायंस में शामिल होने के बीपीएफ के फैसले ने गठबंधन के नेता कांग्रेस सहित सभी घटकों को खुश कर दिया है। विशेष रूप से, 2016 में बीजेपी के साथ हाथ मिलाने से पहले बीपीएफ लंबे समय तक राज्य में कांग्रेस के साथ गठबंधन में था। लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को बीपीएफ की मदद से कांग्रेस के नेतृत्व वाला महागठबंधन हरा पाएगा? बीपीएफ मुख्य रूप से बोडो-आधारित पार्टी है, जिसकी पकड़ मुख्य रूप से बोडोलैंड टेरिटोरियल रीजन (बीटीआर) में है, जिसमें चार जिले हैं- उदलगुरी, चिरांग, कोकराझार और बक्शा। राज्य की आबादी का लगभग 5-6 प्रतिशत है। बीटीआर क्षेत्र में 12 विधानसभा सीटें हैं। इसके अलावा, बोडो मतदाताओं के एक छोटे से हिस्से के साथ कुछ अतिरिक्त सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए के घटक के रूप में बीपीएफ 13 सीटों पर चुनाव लड़ा था। हालांकि बीपीएफ पिछले साल पहली बार बीटीसी में जीत नहीं बना सका था, लेकिन हगराम मोहिलरी के नेतृत्व वाली पार्टी 17 सीटें जीतकर बीटीसी चुनावों में एकल सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने में सफ ल रही। इसके बोडो स्थित प्रतिद्वंद्वी यूपीपीएल, जो अब एनडीए का एक घटक है, ने 12 सीटों पर कब्जा कर लिया, जबकि बीजेपी ने 9 सीटें जीतीं। इससे पता चलता है कि बोडोलैंड क्षेत्र में बीपीएफ अभी भी एक ताकत है। फिर भी, यह एक तथ्य है कि बोडोलैंड क्षेत्र में बीपीएफ का समर्थन घट रहा है। 2005 में हुए पहले चुनाव में, बीपीएफ ने 40 में से 35 सीटों पर कब्जा करके एक बड़ा जनादेश जीता। लेकिन बाद के चुनावों में, उसकी सीट की संख्या कम हो गई। बोडो पार्टी ने क्रमशः 2010, 2015 और 2020 में 26, 20 और 17 सीटें जीतीं। इससे पता चलता है कि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण ताकत होने के बावजूद उसका समर्थन घट रहा है। इतना ही नहीं, बीपीएफ 2014 और 2019 के चुनावों में कोकराझार लोकसभा सीट जीतने में नाकाम रही, कोबरा सरनिया से उसकी हार हुई जो अब गण शक्ति पार्टी का नेतृत्व करते हैं- वह बीटीसी में यूपीपीएल-भाजपा गठबंधन का समर्थन भी कर रहे हैं।
महत्वपूर्ण रूप से, बोडोलैंड क्षेत्र में, बोडो की आबादी कुल आबादी का केवल 27 फीसदी ही है। बहुसंख्यक-गैर-बोडोस-की अपनी समस्याएं हैं, जो आमतौर पर बोडो से भिन्न हैं। बोडोलैंड क्षेत्र में रहने वाले गैर-बोडो हमेशा से बोडोलैंड राज्य के निर्माण के सख्त विरोधी रहे हैं। बोडो और गैर-बोडो के बीच इस तनाव के परिणामस्वरूप इस क्षेत्र में अतीत में ध्रुवीकरण हुआ है। यह ध्रुवीकरण है जिसने कोकराझार लोकसभा क्षेत्र में 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बीपीएफ को हराने के लिए, एक गैर-बोडो नाबा सरानिया की मदद की। दूसरी ओर, जबकि बीपीएफ बोडोलैंड क्षेत्र में अपना समर्थन खो रहा है, इसके प्रतिद्वंद्वी यूपीपीएल क्षेत्र में अपना आधार बढ़ाने में सक्षम है। 2015 के बीटीसी चुनावों में, यूपीपीएल के पहले अवतार पीपुल्स कोऑर्डिनेशन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स (पीसीडीआर) ने 7 सीटें हासिल कीं- और 2020 में, यूपीपीएल 5 सीटें बढ़ाने में कामयाब रहा। यूपीपीएल की सहयोगी भाजपा भी 2020 के चुनावों में 8 सीटें बढ़ाने में सफल रही क्योंकि उसे गैर-बोडो का समर्थन प्राप्त था। हालांकि, बीपीएफ में मुस्लिम वोटों का हस्तांतरण पार्टी के लिए सांत्वना के रूप में आया। यह नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस ने एक बार अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन किया है ताकि आगामी राज्य विधानसभा चुनावों में मुस्लिम वोटों को सुनिश्चित किया जा सके। दिसपुर में सरकार के गठन में मुसलमानों को राज्य की आबादी का लगभग 34 फीसदी हिस्सा बनता है।
यह भी सच है कि बीपीएफ को मुस्लिम वोटों के हस्तांतरण ने 2020 के बीटीसी चुनाव में कांग्रेस-एआईयूडीएफ गठबंधन को भारी नुकसान पहुंचाया, जबकि एआईयूडीएफ ने अपनी सभी 4 सीटें खो दीं, जबकि कांग्रेस ने किसी तरह अपना खाता खोलने का प्रबंध किया। लेकिन साथ ही, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पिछले कुछ वर्षों में एनडीए के दोनों घटक-भाजपा और यूपीपीएल इस क्षेत्र में अपने समर्थन को बढ़ाने में सक्षम हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि बीपीएफ के ग्रैंड एलायंस के साथ हाथ मिलाने से मुस्लिम वोटों के विभाजन को रोका जा सकता है, लेकिन यह देखा जाना बाकी है कि क्या एक कमजोर होता बीपीएफ बोडोलैंड क्षेत्र में उभरते हुए यूपीपीएल और भाजपा का मुकाबला करने में सक्षम होगा।