कट रही जो जिंदगी...

  
कट रही जो जिंदगी,
नहीं है खुशहाल में
जी रहा हूं कैसे,
न जाने किस हाल में...

लिखा गया अब तक,
इस पे कितना अफसाना
मिट चुकी है ख्वाहिशें,
मर चुकी तमन्ना
मुस्कराएगी अपनी भी,
शायद अगले साल में
कट रही जो जिंदगी.....

सीख लो तुम सब्र करना,
जितना है हिस्से की जमीन
कम करो ख्वाब देखना,
जो देखते उम्दा-औ-हसीन
शुकूं से जी रहा था जो,
कैसे जी पाएगा बवाल में
जी रहा हूं कैसे......

अब अकेला तो हूं नहीं,
जो बहकेगें कदम
जाएंगे साथ लेकर,
संग चलने की खाई है कसम
बीत रही जैसे-तैसे,
नहीं ऐसा कुछ जंजाल में
कट रही जो जिंदगी....

किया नहीं गुनाह,
फिर क्योंकर डरना
मिला है जन्म तो,
इक दिन है तुझे मरना
लग रहा खौफ फिलहाल,
इस दुरूह काल में
जी रहा हूं कैसे....

कट रही जो जिंदगी,
नहीं है खुशहाल में
जी रहा हूं कैसे,
न जाने किस हाल में.
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सम्पर्क सूत्र....
.....राजेंद्र कुमार सिंह
लिली आरकेड,फलैट नं-101
इंद्रानगर,वडाला पाथरडीह रोड
नाशिक--09.ईमेल: rajendrakumarsingh4@gmail.com