युवा बेहाल कौन देगा रोजगार ?

आजादी के पश्चात से देश मे जिस अनुपात मे जनसंख्या वृद्दि लगातार हो रही है उस अनुपात मे रोजगार मे वृद्धि की अपेक्षा कमी आयी है, युवाओं को अधिकांश मामलों मे अवसर मिलना या तो बंद हो गया है या जहाँ अवसर है वहाँ भर्ती प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी अवधी मे पूर्ण होने से, अधिकांश युवाओं को निराशा का सामना करना पड़ रहा है | यह किसी एक सरकार की बात नहीं है बल्कि सभी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का यही हाल है | दशकों पहले से हम सभी इस नारे को सुनते चले आ रहें है "रोजी रोटी दे न सके वो सरकार निकम्मी है, जो सरकार निकम्मी है वो सरकार बदलनी है |" इस तरह के नारे सिर्फ कहने और सुनने तक ही सीमित रहें है इनका राजनीति और वोट बैंक पर कभी प्रभाव नहीं पड़ा | आज सारा दामोदर रोजगार को लेकर निजी क्षेत्रों के हाथों मे है जहाँ उनकी अपनी पीड़ा और समस्याएँ है | अधिकांश लोगों के लिए रोजगार की उम्मीद न सत्ता पक्ष से बची है न ही विपक्ष से | पुलिस, न्याय, शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी देश की मजबूत संरचना के आधार बिन्दु होते है आज इन क्षेत्रों मे भी व्यापक स्वीकृत पद खाली पड़े है | जबकि इन क्षेत्रों मे भर्ती से आम आदमी का हित सीधे प्रभावित होता है |

प्रतिवर्ष लाखों युवा एक लंबी पढ़ाई की प्रक्रिया से गुजर करके रोजगार पाने की इच्छा से बाजार मे आते है और उनमे से अधिकांश को अंततः निराशा ही हाथ लगती है | केंद्र सरकार ने दो करोड़ लोगों को प्रतिवर्ष रोजगार देने का वादा किया था, परंतु धरातल पर इसका क्रियान्वयन अभी तक नहीं हो पाया है | जबकि सत्ता मे रहते हुये सात वर्षो का लंबा समय व्यतीत हो गया है | वर्ष 2019 मे जारी एनएसएसओ के आकड़ों के अनुसार देश मे बेरोजगारी दर 45 साल का रिकॉर्ड तोड़ चुकी है | वर्ष 2020 मे जारी एनसीआरबी के आकड़ों के अनुसार वर्ष 2017 मे 10655 किसानों द्वारा आत्महत्या की गयी, जबकि 12241 बेरोजगारो द्वारा आत्महत्या की गयी | इस संख्या मे 2018 मे भी इजाफा हुआ 10349 किसानों द्वारा आत्महत्या की गयी, जबकि 12936 बेरोजगारो द्वारा आत्महत्या की गयी | ये आँकड़े चौकाने वाले इसलिये भी है की वेब साइट स्टेटिस्टा के अनुसार वर्ष 2020 मे कृषि मे 41.49 % उद्योग मे 26.18% और सेवाओं मे 32.33% लोग कार्यरत थे | एनसीआरबी के एक और आकड़ों के अनुसार वर्ष 2018 मे औसतन 35 बेरोजगार और 36 स्वयं रोजगार के लोग हर घंटे आत्महत्या इस देश मे कर रहें है | सीएमआईई के नवीनतम आकड़ों के अनुसार देश मे बेरोजगारी दर जनवरी 2021 की अपेक्षा फरवरी 2021 मे भी बढ़ी है | बेरोजगार युवाओं की इस पीड़ा को समझने के लिए यह आँकड़े काफी है | जबकि वास्तविकता यह है की जो लोग नौकरी मे कार्यरत है उनमे से अधिकांश अपनी योग्यता के अनुरूप स्थान पर नहीं है | प्रोफ़ाइल के अनुसार यदि रोजगार न मिले तो वह रोजगार नहीं हो सकता आज जरूरत "Employment with Dignity" की है | जिसके बारे मे कहना तो दूर किसी के सोच मे भी नहीं है | आज देश मे कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहाँ लोग रोजगार के मुद्दे पर संतुष्ट हों |

नोट-बंदी, जीएसटी और अब कोरोनाकाल ने सबसे अधिक प्रभाव रोजगार पर ही डाला है | कोरोना काल मे जहाँ दशकों से कार्यरत लोगो को नौकरियां गवानी पड़ी, नए लोगों को अवसर मिलना लगभग बंद ही हो गया वही स्वयं रोजगार मे लगे लोग आम जनता द्वारा खर्च न करने से परेशान है | लॉक-डाउन के पहले 3 महीनों मे 20.9 प्रतिशत शहरी लोगो की नौकरियां गयी थी | कभी गैर कृषि क्षेत्र मे 75 लाख सालाना नौकरियां दी जाती थी 2019 तक इनकी संख्या 30 लाख से नीचे रही है | वर्ष 2012 से 2019 मे स्वरोजगार करने वालों की संख्या मे भी कमी आयी है | पिछले 20 वर्षो मे सरकारी नौकरियों मे तेजी से कमी आयी है | भारतीय अर्थव्यवस्था मे 90 प्रतिशत से अधिक योगदान असंगठीत क्षेत्र का है | बेरोजगारी के कई महत्वपूर्ण डेटा / जानकारी आम जनता के सामने आ ही नहीं रही है | इस बेरोजगारी मे योगदान किसी एक सरकार का नहीं है बल्कि पूर्ववर्ती और वर्तमान राज्यों एवं केंद्र सरकार का रहा है जहाँ इस मुद्दे पर कोई बात करना नहीं चाहता | जबकि इसका असर हर तबके, जाति पर है | योजना आयोग से नीति आयोग होने के पश्चात भी रोजगार की समस्या जस की तस बनी हुई है |

बात सरकारी और निजी क्षेत्र मे नौकरियों की हो रही है तो एक तरफ जहाँ सरकारी क्षेत्र मे नीति नियम मजबूती से लागू है वही निजी क्षेत्र मे इसका अभाव है | समान कार्य के लिए समान वेतन मे विसंगति भी अपने चरम पर है | जॉब सुरक्षा लोगों के लिए बेहद जरूरी आयाम है और यह इस लिए भी जरूरी है की इस देश मे अवसरों की व्यापक कमी है ऐसे मे नए नियमों को बनाने की जरूरत है | आदरणीय प्रधानमंत्री जी द्वारा सरकारी कंपनियों के निजीकरण पर जोर देना, और यह कहना - सरकार का काम नहीं है बिजनेस करना, आम लोगों मे असुरक्षा की भावना को जन्म देता है | ऐसे मे यह जरूरी हो जाता है की भले ही निजी क्षेत्र मे लोगों को रोजगार का अवसर सरकार उपलब्ध कराए उसके लिए स्पष्ट नियम कानून आम जन के सामने हो | तभी जनता के भरोसे को कायम रखा जा सकता है | इस देश के आम जन को बेरोजगारी से मुक्ति तभी मिलेगी जबकि इसे वोट बैंक से जोड़कर प्रस्तुत किया जाये | धर्म, जाति, क्षेत्र, व्यक्तिगत हित से ऊपर उठ कर इस मुद्दे को समूहिकता के साथ सामने रखा जाये | किये जा रहें वादों पर न केवल प्रश्न किया जाये बल्कि आगामी चुनाव मे वोट देने से पहले अपने प्रतिनिधि / राजनीतिक पार्टियों को इसका एहसास जरूर कराएं की यह आपके लिए कितना महत्वपूर्ण है | आज भी कई राज्यों मे स्थानों पर रोजगार के लिए धरना प्रदर्शन हो रहा है और उन्हे या तो झूठा आश्वासन मिल रहा है या फिर लठियाँ | सभी लोगों को इस विषय मे जागना इस लिए जरूरी है की आखिर मुद्दा आपका आपकी अगली पीढ़ी के भविष्य का है |

आज त्वरित रूप से जरूरत है की विभिन्न सरकारों के पास अपने स्वीकृत पद को निश्चित समयावधि मे भर्ती पूर्ण करें | विभिन्न आकड़ों के अनुसार देश मे 24 से 30 लाख स्वीकृत पद | इनमे लगभग 10 लाख शिक्षाकों के पद है | इनमे सर्वाधिक बिहार, उत्तर प्रदेश झारखड़ और मध्य प्रदेश के राज्यों मे है | पुलिस मे 5 लाख से अधिक स्वीकृत पद है | विभिन्न न्यायालयों और स्वास्थ्य क्षेत्र मे अनेकों स्वीकृत पद खाली पड़े है | 2019 मे रेलवे मे 4 लाख नौकरियों की बात सामने आयी पर नियुक्ति प्रक्रिया अभी भी चल रही है | रेलवे की दो भर्ती के लिए 2.42 करोड़ लोगो द्वारा फॉर्म भरा जाना देश मे बेरोजगारी की कहानी स्वयं बयाँ कर रहा है | एसएससी मे भर्ती की संख्या, यूपीएससी मे भर्ती संख्या और आईबीपीस मे भर्ती की संख्या मे कमी आई है | जॉब अवसर, निश्चित समय मे पारदर्शी भर्ती, स्वीकृत रिक्त पद पर अविलंब भर्ती, लेटरल एंट्री को बंद करना, रोजगार का अधिकार, अर्बन रोजगार ग्यारण्टी एक्ट जैसे त्वरित कार्यवाही की जरूरत है, जिससे आम जन मे विश्वास कायम रखा जा सके | यदि देश मे सफल चुनाव हो सकते है तो सफल भर्तियाँ क्यों नहीं ?
 
डॉ. अजय कुमार मिश्रा