"राधा का रंग"

रंग भरी पिचकारी मेरी

स्याम सलोना गात ये तेरा
सराबोर दोनों के तन-मन
फागुन निकला बड़ा चितेरा।

चंदन केसर मटकी भर कर
लेकर निकली थी जो घर से
कहां छुपे रणछोड़ थे मेरे
रंगों के या मेरे डर से।

बड़ी भीड़ बृजबालाओं की
कैसे बच कर आयी भीतर
मँडराती माधव पर मेरे
जैसे मधुकर कुसुम कली पर।

खेली तो होगी उन सब ने
श्याम तुम्हारे संग में होली
राधा का रंग जरा अलग सा
प्रेम, समर्पण, भाव जो घोली।

भीग गया उर अंतर सारा
तुमने कैसा रंग ये डाला
कैसे बरसाणे अब जाए
सूने पथ पर भीगी बाला।

सूखती है जब तक यह चोली
राग सुनाओ कुछ बंशी पर
संग तेरे सभी फागुन बीते
वनमाली वर दो यह हितकर।

मधुकर वनमाली
मुजफ्फरपुर बिहार
स्वरचित एवं मौलिक
मो 7903958085