फूल की तरह नाज़ुक था

हां आरज़ूओं की तरह था,
मुझको तो वो तस्स्वुर में
मिला था,,,,,,,,,,,
दुनिया का उसे डर था,
मुझसे वो ख़्वाबों में ही
मिला था,,,,,,,,,,,,,,
फूल की तरह नाज़ुक था,
बनकर खुशबू वो मुझसे
मिला था,,,,,,,,,,,
शराब मैंने कभी पी नहीं,
नशा तो उसकी आँखों से
मिला था,,,,,,,
डर था ग़ैरों से मुझे लेकिन,
धोका तो मुझे ये अपनों से
मिला था,,,,,,,,,,,,
निग़ाहों से निगाहें यकायक
जो मिलीं फ़ूल अरमानों का
खिला था,,,,,,,,,,,,,,,
तन्हायाँ अब मेरा मुक़्क़द्दर
मुश्ताक़,सिला ये वफाओं से
मिला था,,,,,,,,,,,,,,,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद
शाह, 'सहज़'
हरदा
मध्यप्रदेश,,,,,,,,,,,,,