"पुत्र की लालसा"

तीन पुत्रियों का पिता, लालसा था अरमान हृदय में |
अबकी बार जनेगी बेटा ,थे अरमान हृदय में|
तिरस्कार करता था ,पुत्रियों का ना प्रेम हृदय में|
पुत्र मोह की आस लिए ,था भटक रहा जीवन में|
देव कृपा से हुआ जन्म ,इस बार पुत्र का घर में|
शहनाई ,सोहर से आंगन, गूंज उठा था घर में|
लाड लुटाते थे उस पर, हरनाज उठाते उसका|
धीरे-धीरे बड़ा हो गया ,था अरमान जो उसका|
सदा उपेक्षित रही बेटियां, कोई नहीं शिकायत|
मां पापा के मान धर्म को ,करने दे ना आहत|
इधर कुसंगति के चक्कर में, पड़ गया कुल का नायक|
मदिरापान जुआ का आदी; बन गया था खलनायक|
तांडव करता घर में आकर, नष्ट हुई सुख शांति|
पुत्र मोह भी दूर हो गया, मन में जो थी भ्रांति|
इधर पुत्रियां मा पापा का, सेवा मन से करती|
लक्ष्मी बनकर घर आंगन को, सदा सुसज्जित करती|
सोच रहा था पिता मैं कितना, गलत था निज जीवन में|
करता रहा उपेक्षित हीरा, पत्थर के लालच में|
कभी नहीं ठुकराओ बेटी, मान है घर आंगन का|
कूल का मान जो है बेटा, बेटी दो कुल आंगन का |
कहे "रीत" ना पुत्र मोह में , पड़ ठुकराओ बेटी|
बेटा तुम्हें छोड़ सकता है, मगर न छोड़े बेटी|

स्वरचित, अप्रकाशित एवं मौलिक रचना
लेखिका/ रचनाकार :रीता तिवारी "रीत"