रंग जो ऐसा चढ़ा

रंग जो ऐसा चढ़ा
तेरी प्रीत का
फिर कोई दूजा रंग
कोई चढ़ न पाया
बस होकर रह गए तेरे ही
उम्र सारी।।
रंग जो ऐसा चढ़ा
देश का फिर कोई दूजा रंग चढ़ न पाया
बस होकर रह गए तिरंगे के
जब तक रही जान में जान।।
रंग जो ऐसा चढ़ा
ममता का फिर कोई दूजा रंग
चढ़ न पाया
हर सांस हर धकड़न बनी बच्चों की पहली किलकारी से
उनके हर पग पग अपनी नई दुनिया बसाने तक ।।
रंग जो ऐसा चढ़ा
ज़िन्दगी को जीने का
फिर कोई दूजा रंग न चढ़ा
पाया
मिले चाहे दुःख , चुनौती हज़ारों
किया सामना जिंदादिली से
आखरी सांस तक।।
रंग जो ऐसा चढ़ा
कविता का फिर दूजा रंग न चढ़ पाया
शब्दों ,भावों में बहती ही चली गयी बन जीवन का आधार।।
रंग जो ऐसा चढ़ा
प्रीत, देश, ममता, ज़िन्दगी, कविता का
फिर दूजा रंग न चढ़ पाया।।

....मीनाक्षी सुकुमारन
नोएडा