मैं बस में रहूँ

जीने दो मुझकों भी

मैं जीना चाहती हूँ।

खोल अपने परों को

उड़ना चाहती हूँ।

हसरते थोड़ी हैं मेरी

बस गुनगुनाना चाहती हूँ।

औरत हूँ मैं बस

औरत रहना चाहती हूँ।

देवी बन मंदिर में

बैठना नही चाहती हूँ

माँ की गोद

पिता का दुलार चाहती हूँ।

समीर सा बहकना

प्रसून सा महकना चाहती हूँ।

मैं भी रेत पर निशां

कदमों के छोड़ना चाहती हूँ।

मेरी मंजिलों के रास्ते

मैं स्वयं खोजना चाहती हूँ।

छोटी ही सही पर

अपनी पहचान चाहती हूँ।

मैं बस मैं रहूँ

इतना चाहती हूँ।


कवयित्री:-गरिमा राकेश गौत्तम

पता:-कोटा राजस्थान