वो आजाएँ तो कुछ आंखों में नूर आजाए,,,,,,,,,

आफ़ताब उम्र का ये तो ढलने वाला है,
आएं वो तो ज़िन्दगी की बात हो जाये,

अपनी क़ीमत ज़माना लगा नहीं सकता,
वो आजाएं तो जीने का सामान हो जाए,

डूबना मुक़द्दर है मेरा तो कोई बात नहीं,
आजाएं तो साहिल की उम्मीद हो जाए,

हर फर्द में फ़र्क़,नुमाया है ज़रा देखो तो,
वो आजाएं तो बाहें गले का हार हो जाएं,

कहकहे खोखले हर सू अब सुनाई देते हैं,
वो आजाएं तो सुकून दिल को हो जाए,

हर तरफ़ अंधेरा है,मुश्ताक़ मैं नाबीना सा,
वो आजाएँ तो कुछ आंखों में नूर आजाए,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद
सहज़
हरदा मध्यप्रदेश,,,,,