डंका बजते ही पहले पड़ाव को कूच कर चला रामादल

सीतापुर। रविवार की भोर होते ही नैमिषारण्य क्षेत्र रामधुन से गूंज उठा। पहला आश्रम के महंत भरतदास के द्वारा डंका बजते ही श्रद्धालु परिक्रमा मार्ग पर चल पड़े। सीताराम के जयकारों के साथ पौराणिक 84 कोसी यात्रा आरंभ हो गई।

संत महंतों व श्रद्धालुओं ने चक्रतीर्थ व गोमती में स्नान की मां ललिता देवी मंदिर समेत अन्य मंदिरों में माथा टेका। जिसके बाद भगवान गणेश को लडडू का भोग लगाकर पहले पड़ाव कोरोना के लिए चल पड़े। रास्ते भर श्रद्धालु रामभक्ति में नाचते गाते आगे बढ़ते रहे। परिक्रमा मार्ग पर पड़ने वाले गांवों के ग्रामीणों ने भी श्रद्धालुओं के स्वागत के इंतजाम कर रखे थे। जगह-जगह भंडारे चल रहे थे। कई जगह टी स्टाल लगे हुए थे। श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण कर आगे बढ़ते रहे। इस दौरान संत महंत हाथी, घोडा, पालकी व अन्य वाहनों से परिक्रमा करते नजर आए। दोपहर को परिक्रमा कोरौना पड़ाव पहुंची, जहां पर श्रद्धालुओं ने डेरा डाल दिया। अब सोमवार को श्रद्धालु इस पड़ाव से कूचकर हरैया के लिए निकलेगे।

भगवान भरोसा सुरक्षा

परिक्रमार्थी तो भगवान का नाम लेकर आगे बढ़ रहे थे, वहीं परिक्रमा मार्ग की सुरक्षा व्यस्था भी भगवान भरोसे नजर आ रही थी। कोरौना पड़ाव पर पहुंचने से पहले श्रद्धालुओं का रेला सिधौली-मिश्रिख मार्ग पर पहुंचता है। ऐसे में जिस स्थान से श्रद्धालुओं का सैलाब मुख्य सड़क पर आ रहा था, वहां पर यातायात व्यवस्था सुधारने के लिए पुलिसकर्मी ही तैनात नहीं थे। हालत यह थी तो होमगार्ड सड़क के किनारे खड़े जरूर दिखे, लेकिन वो भी बोले की उनकी ड्यूटी वहां पर नहीं है। ऐसे गन्ना लोड हैवी वाहन हार्न बजाते हुए धड़ल्ले से निकल रहे थे, इन सबके बीच श्रद्धालु खुद ही हटो बचो करते हुए आगे बढ़ रहे थे। जिनके सिर पर हादसे का खतरा मड़रा रहा था। कुल मिलाकर यहां की सुरक्षा भगवान भरोसे ही नजर आई।

एक रात के लिए बसी धर्म नगरी

कोरौना पड़ाव पर एक रात के लिए धर्म नगरी बस गई। जो भी श्रद्धालु कोरौना पड़ाव पर पहुंचा, उसने वहां पर अपना टेंट लगा लिया। महिलाओं ने आनन फानन चूल्हा तैयार किया। जिसके बाद उस चूल्हे पर बर्तन चढ़ गए। श्रद्धालु यहां पर भोजन भजन करने के साथ रात्रि विश्राम करेंगे। इस दौरान संत महंत श्रद्धालुओं को धर्म के बारे में ज्ञान देंगे।