चाहतों का ज़माना नहीं रहा

 

वो हमसफ़र था मेरा,अब

मेरा हमसफ़र नहीं रहा,

मेरी चाहतें वो ही अब भी हैं,

चाहतों का ज़माना नहीं रहा,

दिल की बात सुन पास आ,

मेरी आहों से तो बात कर,

क्या तेरे दिल मे अब मेरी,

मुहब्ब्त का जज़्बा नहीं रहा,

दिल की धड़कनों में अब

भी मेरी तू ही है बसा हुआ,

तेरी आँखों में बीते लम्हों

का क्या वो मंज़र नहीं रहा,

तेरे खतों में तेरे लफ़्ज़ों के 

फ़ूल अभी भी ज़िंदा हैं,

तेरे वजूद में क्या मेरा कोई

भी ,बता हिस्सा नहीं रहा,

तू तो ऐसे गया जैसे मुझसे

कभी मिला ही नहीं हो,

क्या दिल की रह गुज़र पर

मुश्ताक़ का आना नही रहा।

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

"सहज़" हरदा मध्यप्रदेश,