डेमोक्रेसी से ऑटोक्रेसी की राह पर मुल्क

हाल ही में अलग-अलग देशों की अनेक स्वतंत्र संस्थाओं ने भारतीय लोकतंत्र में आ रहे घातक और नकारात्मक बदलावों की ओर संकेत किया है। हमारी सरकार, सत्तारूढ़ दल की आईटी सेल, सरकार समर्थक ट्रोल समूह और सोशल मीडिया पर सक्रिय दिखाई देने वाला खासा बड़ा नागरिक समुदाय सब के सब समवेत रूप से वैश्विक मान्यता रखने वाली इन प्रतिष्ठित संस्थाओं के आकलन को न केवल सिरे से खारिज कर रहे हैं बल्कि इसे एक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं जो नए भारत की प्रगति से घबराई हुई विश्व शक्तियों द्वारा रचा गया है। सरकार और सरकार समर्थकों की यह आक्रामक,अतिरंजित और असहिष्णुतापूर्ण प्रतिक्रिया ही इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है हम डेमोक्रेसी से इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी में तब्दील हो चुके हैं जहां असहमति और आलोचना को बर्दाश्त नहीं किया जाता और इसे राष्ट्र विरोधी गतिविधि की संज्ञा दी जाती है। स्वीडन के वी डेम इंस्टीट्यूट ने बताया है कि वह विगत वर्ष ही भारत को इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी का दर्जा देने वाला था किंतु आंकड़ों की पर्याप्त उपलब्धता के अभाव में उसने ऐसा नहीं किया। वी डेम की रिपोर्ट में भारत पिछले वर्ष की तुलना में सात स्थानों की गिरावट के साथ कुल 180 देशों में 97वें स्थान पर है। ऑटोक्रेटाइजेशन टर्न्स वायरलश् शीर्षक रिपोर्ट में यह संस्थान भारत को थर्ड वेव ऑफ ऑटोक्रेटाइजेशन के अंतर्गत आने वाले देशों में शामिल करता हैं। ब्राजिल, भारत, टर्की और अमेरिका जैसे देश इस बदलाव का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जहां सरकारें मीडिया, अकादमिक संस्थाओं और सिविल सोसाइटी पर हमलावर हो रही हैं। समाज का ध्रुवीकरण किया जा रहा है। विरोधियों के अनादर और गलत सूचनाओं के प्रसार की प्रवृत्ति बढ़ी है। भारत का लिबरल डेमोक्रेसी स्कोर 2013 के .57 से घटकर 2020 में .34 रह गया है।

रिपोर्ट बताती है कि नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने से पूर्व भारत में मीडिया की स्वतंत्रता संबंधी स्कोर कुल संभावित 4 अंक में 3.5 रहा करता था जो 2020 में घटकर 1.5 रह गया है। रिपोर्ट सरकार द्वारा राजद्रोह कानून, आतंकवाद निरोधक कानून और मानहानि संबंधी प्रावधानों के दुरूपयोग की ओर संकेत करती है और बताती है कि बीजेपी के सत्ता में आने के बाद 7000 लोगों पर राजद्रोह का मुकदमा लगाया गया है जिनमें से अधिकांश सरकार के आलोचक हैं।

इसी माह अमेरिकी सरकार द्वारा वित्त पोषित एनजीओ फ्रीडम हाउस ने भारत का दर्जा स्वतंत्र से घटाकर आंशिक स्वतंत्र कर दिया है और इसके लिए सत्ता की नीतियों से असहमति रखने वाले मीडिया कर्मियों, विद्वानों, सिविल सोसाइटी समूहों तथा प्रदर्शनकारियों के सरकार द्वारा दमन को उत्तरदायी बताया है। हमारा स्कोर विगत वर्ष के 71ध्100 से घटकर 67ध्100  हो गया है। फ्रीडम हाउस की रिपोर्ट के अनुसार नरेन्द्र मोदी के 2019 में दुबारा सत्ता में आने के बाद राजनीतिक अधिकारों, नागरिक आजादी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता में गिरावट देखी गई है। दोनों ही रिपोर्ट्स अपने-अपने स्रोतों से तैयार की गई हैं और हमारे लोकतंत्र में आ रही गिरावट की ओर संकेत करती हैं। किंतु जो बात इन रिपोर्टों में व्यापकता के साथ नहीं आ पाई है वह यह है कि इस निरंकुशता और बहुसंख्यक धार्मिक समुदाय के वर्चस्व के दर्शन को समाज का एक भाग स्वीकार कर रहा है तथा हिंसक प्रतिशोध को सामाजिक स्वीकृति मिल रही है। यह स्थिति उस तानाशाही से अधिक खतरनाक है जहां कोई एक क्रूर शासक अपनी सैन्य शक्ति के बल पर जनता पर अपनी मनमर्जी चलाता है क्योंकि तब यह आशा अवश्य उपस्थित होती है कि पीड़ित और असंतुष्ट जनता कभी न कभी विद्रोही तेवर अपनाएगी और तानाशाह का अंत होगा। किंतु हमारे देश में विचारधारा विशेष के समर्थकों में निरंकुशता, हिंसा, प्रतिशोध, असहिष्णुता और एकाधिकार की भावना का इस प्रकार बीजारोपण कर दिया गया है कि वे आत्मघाती दस्ते की भांति कार्य कर रहे हैं। विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया सभी में धीरे-धीरे धर्म आधारित संकीर्ण राष्ट्रवाद के समर्थकों को स्थान मिलता जा रहा है। लोगों को धीरे-धीरे यह समझाया जा रहा है कि एक अच्छा लोकतंत्र एक कमजोर राष्ट्र बनाता है, अपने अधिकारों की मांग करने वाले नागरिक सच्चे राष्ट्रभक्त नहीं हैं बल्कि वे नागरिक आदर्श माने जा सकते हैं जो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं। किंतु संवैधानिक कर्तव्यों के स्थान पर राजसत्ता की इच्छा को कर्तव्यों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। देश में बहुसंख्यक वर्ग के वर्चस्व के दर्शन का विस्तार हम संसद की कार्य प्रणाली में देखते हैं जहां अनेक संवेदनशील और महत्वपूर्ण कानूनों के निर्माण के दौरान विपक्ष की पूर्णतरू अवहेलना की गई। चाहे वह सीएए का मसला हो या धारा 370 के कतिपय प्रावधानों को अप्रभावी बनाने की बात हो या हाल के तीन कृषि कानून हों सरकार का रवैया संवाद और परिचर्चा को नकार कर बहुमत की दादागिरी दिखाने का रहा है। संविधान और न्याय प्रणाली पर सीधे आक्रमण करने का साहस अभी वर्तमान सत्ता के पास नहीं है। इसलिए धर्म आधारित संकीर्ण राष्ट्रवाद के समर्थक आम जनता को उस मानसिकता की ओर धीरे-धीरे ले जा रहे हैं जिसमें प्रवेश करने के बाद संविधान उसे अनावश्यक लगने लगेगा। गो रक्षकों की मॉब लिंचिंग, हॉनर किलिंग की घटनाएं, बलात्कारियों के एनकाउंटर की मांग आदि प्रवृत्तियां यह दर्शाती हैं कि समाज को ऐसे हिंसक प्रतिशोध का अभ्यस्त बनाया जा रहा है जो संविधान और कानून द्वारा पूर्णतरू अस्वीकार्य है। आश्चर्य है कि उत्तरप्रदेश जैसे राज्य के मुखिया एनकाउंटर कल्चर को अपनी प्रशासनिक मजबूती के सर्वश्रेष्ठ प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं और मध्य प्रदेश एवं बिहार के जनप्रतिनिधियों द्वारा सार्वजनिक रूप से अपराध नियंत्रण के इस एनकाउंटर मॉडल को अपने प्रदेश में अपनाने की मांग की जा रही है। भोजन-आवास-चिकित्सा-शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में सरकार की नाकामी से उपजे जनाक्रोश को काल्पनिक शत्रुओं की ओर धकेला जा रहा है और आपस में ही लड़ने और मरने मारने पर उतारू एक कबीलाई समाज अस्तित्व में आ रहा है। सोशल मीडिया के माध्यम से सवर्ण समुदाय और मध्य वर्ग को लगातार यह बताया जा रहा है कि उसकी बदहाली के लिए कथित रूप से शत्रु देश के प्रति वफादार अल्पसंख्यक, काल्पनिक घुसपैठिये और आरक्षण का लाभ उठा रहे अयोग्य और मुफ्तखोर दलित-आदिवासी जिम्मेदार हैं। यह सवर्ण वर्ग अभी भी हमारी राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासन तंत्र में गहरी पकड़ रखता है। लोकतंत्र पर धर्म के बढ़ते प्रभाव का सबसे बड़ा खामियाजा महिलाओं और वंचित समाज को उठाना पड़ रहा है। बहुसंख्यक वर्ग को अतीतजीवी बनाया जा रहा है। उसे समझाया जा रहा है कि उसकी शांतिप्रियता और सहिष्णुता के कारण ही तथाकथित रूप से  सदियों तक उसका  अन्य धर्मावलंबियों ने शोषण किया और अब उसे हिंसक और आक्रामक बनना होगा।

हमारे लोकतंत्र के स्थायित्व और इसकी सफलता के पीछे हमारे स्वाधीनता संग्राम की अहिंसक और सर्व समावेशी प्रकृति का सबसे बड़ा योगदान रहा है। हमारे बहुधार्मिक, बहुजातीय, बहुभाषिक देश की एकता और अखंडता अक्षुण्ण रही है तो इसका सबसे बड़ा कारण हमारे स्वाधीनता संग्राम के दौरान रखी गई वह सशक्त बुनियाद है जिसमें धर्म निरपेक्षता, सहिष्णुता और समानता जैसी विशेषताएं रची-बसी हैं। यही कारण है कि उग्र दक्षिणपंथी शक्तियां स्वाधीनता आंदोलन और उसके नायकों को खारिज करने, उन्हें महत्वहीन बनाने अथवा इनके साम्प्रदायिक हिंसक पाठ तैयार करने की जबरदस्त कोशिश कर रही हैं. आज के मीडिया निर्मित नायक की आभासी विशेषताएं कुछ इस तरह गढ़ी गई हैं कि एक जननेता से तानाशाह तक का सफर बहुत जल्दी तय किया जा सके। यह नायक बहुसंख्यक वर्ग के वर्चस्व का हिमायती है और अपने धार्मिक एजेंडे को छिपाता नहीं है बल्कि उस पर गर्व करता है। भारतीय लोकतंत्र की अब तक की विशेषताओं यथा धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक वर्ग का सम्मान एवं संरक्षण, वैदेशिक मामलों में तटस्थता की नीति, आत्म रक्षार्थ सैन्य प्रयोग और विस्तारवाद के निषेध को यह नायक कमजोरी के रूप में प्रस्तुत करता है। यह नायक एक ऐसी आक्रामक सेना की वकालत करता है जो आंतरिक अदृश्य शत्रुओं और बाह्य शत्रुओं के साथ समान कठोरता से पेश आए। जब सेना अदृश्य आंतरिक शत्रुओं का उन्मूलन करने लगेगी तब सेना के हमारे नागरिक जीवन में प्रवेश की आशंका भी बढ़ जाएगी। यह आश्चर्यजनक है कि आज विश्व की 68 प्रतिशत जनता ऑटोक्रेटिक शासन के अधीन जीवनयापन कर रही है किंतु उससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक है इस गिरावट को लोकतंत्र के दोषों के सुधार के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि लोकतांत्रिक स्वतन्त्रता प्रखर राष्ट्रवाद के मार्ग में बाधक है। किंतु इस बात पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है कि इस राष्ट्रवाद की परिभाषा सत्ताओं ने अपनी सुविधानुसार अपने वर्चस्व को चिरस्थायी बनाने हेतु तय की है। इसी प्रकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया को विकास की धीमी गति के लिए उत्तरदायी ठहराने का तर्क भी पुराना है और तानाशाह प्रायरू इसका सहारा लेते रहे हैं। हमें यह समझना होगा कि जिस आम आदमी का विकास करना है यदि उसे ही निर्णय प्रक्रिया से अलग कर दिया जाए तो फिर उस विकास की प्रकृति मानव द्रोही हो सकती है। डेमोक्रेसी मानव सभ्यता के विकास और मनुष्य के राजनीतिक जीवन का बहुत बड़ा हासिल है और इसे कमजोर या खत्म करने की कोई भी कोशिश प्रतिगामी ही कही जा सकती है।