छोटे_कदम!

एक महिला शहरी योजना सलाहकार अपनी सहकर्मी से बातचीत में मशगूल थी, “पितृसत्तात्मक समाज में हम महिलाएँ किसी बदलाव की कल्पना करें, तो जरा असंभव सा लगता है। पर जुझारू महिलाओं ने छोटे-छोटे कदम बढ़ाने शुरू कर दिए हैं। हाल में ही मैंने फेसबुक पर अपने स्कूल के जमाने की हिंदी शिक्षिका, लेखिका का संस्मरण पढ़ा-

मेरे बेटे की शादी की सुबह-सुबह मेरे पास एक फोन आया, “दूल्हे को नहला कर उसमें से एक बोतल पानी भेज दीजिएगा।”

“किसलिए?”

“दुल्हन के ऊपर छींटे मारने हैं”, दुल्हन की माँ ने कहा।

“कैसी बे-बुनियाद रस्म है?” मेरी शिक्षिका का दिमाग घूम गया, “अगर ऐसी कोई रस्म है तो दुल्हन का नहाया हुआ पानी भी भेजिए, मैं भी दूल्हे, यानी अपने बेटे पर छींटे मारूँगी”, कहकर हँस दीं।

स्कूल में भी वह कहा करती थीं, “परंपराएँ सांस्कृतिक विरासत ही सही पर पितृसत्तात्मक समाज का ढोल पीटती नजर आती हैं, जिन्हें समाज जानबूझकर ढो रहा है।”

विवाह के वक्त हमारे बिहार की एक रीत 'गुरहंथी' है, जिसमें मंडप में वर पक्ष द्वारा लाए गए गहने कपड़े को दुल्हन को समर्पित करने की परंपरा दूल्हे के बड़े भाई को निभानी होती है। सगा भाई न हो तो चचेरा, ममेरा, फुफेरा बड़ा भाई यह विधि पूरी करता है, जिसका मर्म दुल्हन को भरोसा दिलाना एवं ससुराल में सुरक्षा करना भी होता है। विवाह में मेरी शिक्षिका ने इस रस्म को दूल्हे की दीदी से पूरा करवाया, क्योंकि कोई सगा बड़ा भाई नहीं था। लड़की वालों में थोड़ी ना-नुकुर, थोड़ी खुसुर-फुसुर हुई, पर विधि संपन्न हो गई।

वजनदार उदाहरण तो नहीं है, पर फिर भी एक छोटा सा प्रयास तो है। मैं नहीं कहती कि सारी कुरीतियाँ-बेड़ियाँ एक झटके में उड़न छू हो जाएँगी, पर हमें उम्मीदों का दामन थामे छोटे-छोटे प्रयास करने हैं, तभी बदलाव की खुशनुमा बयार बहेगी।

“तेरी बात सही है, दोस्त!” सहकर्मी ने कहा।

#नीना_सिन्हा/पटना।(स्वरचित)