इस बार में होली में

पड़े हम इस तरह अबकी दफा बीमार होली में,

दवा एक डॉक्टर की खा गई घर बार होली में।

उड़ा है रंग ही चेहरे का जब इस बार होली में,
हमारे वास्ते हर रंग है बेकार अब बार होली में।

न राशन है, न शासन है, न कपड़े हैं, न पैसे हैं,
उड़ा कर ले गया तनख्वाह पॉकिटमार होली में।

कृपा से एक पत्नी, एक दर्जन पुत्र हैं घर में
लगा देंगे मिल के बेड़ा पार इस बार होली में।

सुना है पाँव भारी हो गया है आजकल
बड़ा मँहगा पड़ेगा दोस्तों यह प्यार होली में।

ये फागुन का महीना जैसे पतझर का जमाना है,
नजर आते हैं हर सूं मौत के आसार होली में।

हमारी बदनसीबी थी कि होली बाद वो पहुँचा,
लगाया था जो उनके पास हमने तार होली में।

महाजन माँगता है सूद पिछले साल का साथी,
 बंद हो गया जाना बाजार इस बार होली में।

पड़े हम इस तरह अबकी दफा बीमार होली में,
दवा एक डॉक्टर की खा गई घर बार होली में।
       
         --प्रिंस अभिषेक
    जनता बाजार, छपरा , बिहार