नही बनना मुझे

नही बनना मुझे
मैथिली तेरी तरह
मैं तो वन-वन
कांत संग चलूँ
  और
कांत अपनी शान में
मेरा परित्याग कर दे।
क्यूँ हर बार
तपस्या करके
मैं ही शिव को
प्राप्त करूँ
हर जन्म में प्रेम
साबित कर
सती, दुर्गा
अम्बा भवानी
नव-नव नाम धरूँ।
पांचाली बन क्यूँ
मैं जूएं में हारी जाऊं।
अहिल्या बन प्रस्तर
रूप धराऊं
श्री चरण से
रूप पाकर
फिर गौत्तम संग
क्यूँ जाऊं।
शची बन क्यूँ
मैं ही शुचिता अपनाऊ
तुम इन्द्र बनते रहो
मैं धोखा खाती जाऊं।
नहीं बनना मुझे
उर्मिला, सीता,पार्वती
यशोधरा या अहिल्या।
मैं बनूँ शांडिली
सी नार
प्राण संकट में हो
कांत के
रोक दूँ
सूरज का प्रकाश
मैं बनूँ सावित्री
सी नार
यमराज से छीन लूँ
स्वामी के प्राण।
रानी लक्ष्मी बन
धरोहर सँभालूँ
पति की
अंतिम सांस तक
लड़कर
रक्षा करूँ
प्रण-प्राण की।

कवयित्री:-गरिमा राकेश गौत्तम
पता:-कोटा राजस्थान

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