पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब - बेरोजगारी ने बना दिया अब यह ख्वाब


वर्तमान परिवेश में बेरोजगारी सबसे बड़ी समस्या - रणनीतिक उपचार जरूरी - एड किशन भावनानी। 

गोंदिया - रेडियो पर एक दशकों पुराना गीत सुना- पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब, और दूसरा, एक छोटी सी नौकरी का तलबगार हूं मैं, तुमसे कुछ और मांगू तो गुनहगार हूं मैं। यह गीत सुनकर बहुत हैरानी हुई और बात समझ में आई कि, यह बेरोजगारी की समस्या इतने दशकों पुरानी है हालांकि यह समस्या आगे बढ़ते वर्षों और दशकों अनुसार बढ़ती चली जा रही है अगर बात वर्तमान परिवेश की करें, जिनके पास डिग्री है, योग्यता है, लेकिन नौकरी नहीं है। हमेशा आपने सुना होगा - पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, लेकिन क्या कारण है कि हालत अब पढ़ोगे लिखोगे तो बनोगे बेरोजगार जैसी हो रही है। महाविद्यालय की डिग्री लेकर रोजगार की तलाश में भटकते हुए नवयुवक के चेहरे पर निराशा और चिंताका भावहोना, आजकल देखना सामान्य सी बात हो गई है। कभी-कभी रोजगार की तलाश में भटकता हुआ युवक अपनी डिग्रियां फाड़ने अथवा जलाने के लिए विवश दिखाई देता है। वह रात को देर तक बैठकर अखबारों के विज्ञापनों को पड़ता है। आवेदन पत्र लिखता है साक्षात्कार लेता है और नौकरी ना मिले पर पुनः रोजगार की तलाश में भटकता रहता है। युवक अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी खोजता रहता है।घर के लोग उसे निकम्मा समझते हैं समाज के लोग आवारा कहते हैं, निराशा की नींद सोता है और आंसुओं के खारे पानी को पीकर समाज को अपनी मौन व्यथा का सुनाता है। बेरोजगारी किसी भी देश के विकास में प्रमुख बाधाओं में से एक है। भारत में बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा है। हर व्यक्ति के लिए शिक्षा का बड़ा बजट जिसमें फीस, बोर्डिंग, कोचिंग इत्यादि शामिल है, रोजगार के अवसरों की कमी और प्रदर्शन संबंधी समस्याएं कुछ ऐसे कारक हैं जो बेरोज़गारी का कारण बनती हैं। इस समस्या को खत्म करने के लिए भारत सरकार को प्रभावी कदम उठाने की ज़रूरत है और रणनीतिक उपचार जरूरी है। कोविड-19 की शुरुआत से यह बेरोजगारी की समस्या बहुत तेजी से बढ़ती चली गई है और वर्ष 2020 पूरा वैश्विक रूप से हर क्षेत्र के लिए खराब रहा और भयंकर बेरोजगारी उत्पन्न हुई जो एक कुदरती विपदा थी और साल बीतते बीतते अंत में स्थिति में सुधार आया,लेकिन अभी साल 2021 में फिर कोरोना महामारी ने रफ्तार पकड़ ली है और रोजगार पर फिर असर पड़ना चालू हो गया है। हालांकि कोविड-19 के 2020 की स्थिति पूरी संभली नहीं थी रोजगार देने में परंतु फिर अभी महामारी ने तीव्र गति से संक्रमित दर बढ़ने से रोजगार की स्थिति डांवाडोल होने का अंदेशा चालू हो गया है हालांकि शासकीय, प्रशासकीय स्तर पर कोरोना महामारी का असर पड़ने पर आर्थिक व अनेक उपाय किए गए थे और अभी भी जारी हैं,परंतु अगर मुद्दा रोजगार का करें, तो कोरोना के  बढ़ते प्रभाव से लॉकडाउन चालू होने और लोगोंके घर बैठने के अलावा कोई उपाय नहीं है इस स्थिति से बेरोजगारी की तीव्रता में वृद्धि होगी। हालांकि सरकारें अनेक पदों में रोजगार का सृजन करने का दावा करती है परंतु हम देखते हैं कि किसी सरकारी क्षेत्र में कोई सौ पद की भर्ती के लिए विज्ञापन आता है तो वहां आवेदन हजारों में पहुंचते हैं कभी-कभी यह संख्या लाख में भी हो जाती है। यह हमें प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के माध्यम से देखनेको मिलता है और ऐसा लगातार ही यह हो रहा है चाहे कितनी भी सत्ताधारी पार्टियां आई और चली गई और दशकों से इसका अभी तक विकल्प नहीं आयाहै हालांकि बजट 2021 में वित्त मंत्री ने अनेक क्षेत्रों के निजीकरण की ओर क़दम बढ़ाने और उसके आधार पर व्यवस्था में विकास की बातें जनता के सम्मुख लाई गई, परंतु उससे भी कर्मचारियों में रोजगार पर असर पड़ने के भय की वास्तविकता हमने बैंकों के 15, 16 मार्च 2021 के देशव्यापी बंद के रूप में देखा।जिसका प्रभाव औरभी अन्यक्षेत्रों में देखने को मिलने की संभावना है याने जिसको रोजगार है उसे भी बेरोजगार होने का भय सता रहा है, तो जो ऑलरेडी बेरोजगार हैं उसकी क्या हालत होगी। आज शिक्षा ग्रहण करने के लिए बजट बहुत ही बड़ा हो गया है और साधारण परिवार बालों के लिए उसे वहन करना बहुत मुश्किल हो रहा है और मुश्किलों से जूझ कर पढ़ाई पूरी कर और बेरोजगार रहे तो यही मन में विचार आता है कि इतने बड़े बजट में डिग्री हासिल की है और फिर भी बेरोजगार बैठे हैं यह क्षण कितना दुखदाई है जिस पर बीती है इसका अंदेशा वही लगा सकते हैं और उन्हें यही ध्यान आएगा पढ़ोगे लिखोगे बनोगे नवाब बेरोजगारी ने बना दिया अब यह ख्वाब।

लेखक- कर विशेषज्ञ एड किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र