देखो कैसी मस्त

रंग बिरंगी पतंग उड़ रही हैं

नीली पीली हरी उड़ रही हैं।

देखो कैसी मस्त झूम रही हैं

आजाद पंछी सी घूम रही हैं ।

देखो इधर न उधर देख रही हैँ

आनंद की खुशबू फेंक रही हैं ।

बच्चे बूढ़े जवान हंस रहे हैं

देख देखकर सब हंस रहे हैं ।

हार जीत की शर्त चल रही है

ठंडी ठंडी पवन चल रही है ।

जाने पतंगे क्या सोच रही हैं

उत्थान या पतन सोच रही हैं ।

न तो कोई पतंगें  डर रही  हैं

ये तो अपनी उड़ान भर रही हैं।

कट भी गयीं तो वे कह रही हैं

वृक्ष पर रहेंगी वे कह रही हैं ।

प्रकृति सबको जीवन दे रही है

प्रकृति ही मानव चोट खा रही है ।

लगीं हाथ किसी के सोच रही हैं

फिर भरेंगे उड़ान सोच रही हैं ।

बढ़े चलो बढ़े चलो सिखा रही हैं

डरो न  डरो न  यह बता रही हैं।

नबाब हो या चाहे कोई सेवक है

समानता से सब पतंग उड़ा रहे हैँ ।

उड़ उड़  कर पतंगें  समझा रही हैं

जमीन ही अपनी पतंगें बता रही हैं।

पूनम पाठक