चूल्हा तो जला दो

तुम्हें मुझसे प्यार है

अब मैं तुम्हें

इतना खास हो गया

कि मेरी जड़ें

फैली है धरा

तुम्हें मुझसे प्यार है

क्या तुम्हारा ईमान है

धर्म भूल जाते हो

रिश्ते भूल जाते हो

पर मुझे न भुलाते हो

इंसानियत मिटाते हो

कुछ तो जरा सोचो

सच जरा बोलो

जब छा जाऊंगा

यहां वहां सारा जहां

क्या करोगे तुम

मुझे हरा सकोगे तुम

तुम मुझे अपनाते हो

मानव को रुलाते हो

जिसे जो चाहिए मिलना

उसे वह नहीं मिलता

दो दिन के काम में

दो माह बीत जाते

कभी पैर थकाता हूं

कभी सच  को हराता हूं

दिखाता हूं मैं असर

गलती लोगों की मगर

मैं तो निर्जीव हूं

लालचियों के करीब हूं

मैंने कितनों को तोड़ा है

दिल पैसा नौकरी से

क्या तुम मुझे रोकोगे

क्या तुम मुझे रोकोगे

मैं धीरे-धीरे

असर कर रहा हूं

मैं छिप छिपकर कर

जिंदगी बसर कर रहा हूं

मुझे जानते सब हैं

लोग मानते कब हैं

रोते को हंसा दो

चूल्हा तो जला दो

मैं वही भ्रष्टाचार हूं

मैं वही भ्रष्टाचार हूं

तुम्हें मेरी आदत और

मुझे है तुम्हारी आदत

पर बाकियों का

अपराध है क्या

पूनम पाठक बदायूं