जीवन में उल्लास भरती होली

‘होली’ पर्व का नाम जेहन में आते ही तरह-तरह के रंगों में पूते हर उम्र के लोग, लड़खड़ाते कदम, बड़बड़ाते-बोल और लड़के-लड़कियों के झुण्ड आदि की तस्वीरें मानस में स्पष्ट रूप से ऊभर कर सामने आ जाती है। इस त्योहार में हर धर्म, पंथ और विचार के लोग शामिल होते हैं। फागुन मास के अंतिम दिन में मनाई जाने वाली होली पर्व का उद्गम स्थल भारत है। विश्व के जिन-जिन देशों में भारतीय  हैं, बड़े उत्साह के साथ होली मनाते हैं। विदेशों में भी होली काफी लोकप्रिय त्योहार बन चुका है। वहाँ के स्थानीय निवासी भी ‘होली’ पर्व में बड़े उत्साह के साथ शामिल होते हैं और भारतीयों के साथ मिल-जुलकर रंग-गुलाल लगाते हैं। आज यह पर्व विश्व संस्कृति का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। दिन-ब-दिन इस पर्व की ख्याति बढ़ती चली जा रही है। भारत में मनाया जाने वाला यह ‘रंगोत्सव’ कब से मनाया जा रहा है ? इस पर्व की मनाने की कथा क्या है ? होली को रंगोत्सव क्यों कहते हैं? भारत की सभ्यता एवं संस्कृति बहुत पुरानी और कई काल खंडों में समाई हुई है। हमारी संस्कृति के दो वाहक अथवा नायक ‘राम’ और ‘कृष्ण’ के प्रादुर्भाव के बाद से कई पर्व मनाने की प्रथा की शुरूआत हुई थी। 

राम और कृष्ण दो ऐसे महापुरुष व देवता का उदाहरण सामने हैं जो धर्म के पुनसर््थापना के लिए मनुष्य के रूप में भारत भूमि पर जन्म लिये थे। द्वय देवताओं ने अपने पराक्रम से असत्य का नाश कर धर्म को प्रतिष्ठित किया था। भारतीय संस्कृति पर राम और कृष्ण की लीला का गहरा प्रभाव है। भगवान कृष्ण की लीला से कौन भारतीय अपरिचित हैं ? कृष्ण ने अपने बाल रूप में जो लीला की थी वह सिर्फ कृष्ण से ही संभव था। कृष्ण अर्थात ईश्वर, जो सृष्टि के रचयिता के साथ संहारक भी है। एक ओर समस्त गोपियों के कष्ट को दूर कर स्वयं में समाहित कर प्रेम की गहराई तक ले जाते हैं तो दूसरी ओर कंश सहित कई असुरों का नाश कर धर्म की स्थापना करते हैं। राधा-कृष्ण की प्रेम लीला अद्वितीय है। इस प्रेम-लीला की अन्य किसी प्रेम लीला से तुलना नहीं की जा सकती है। राधा-कृष्ण के नाम का जाप ही सभी बंधनों से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। ऐसा श्रीमद्भागवत का कथन है। 

मथुरा और ब्रज की होली विश्व भर में विख्यात है। यहाँ के निवासी बड़े ही धूम-धाम के साथ होली पर्व मनाते हैं। लाखों की संख्या में देश भर के लोग यहाँ जुटते और होली मनाते हैं। इस अवसर पर विदेशी पर्यटक भी काफी संख्या में आते हैं और मथुरा की होली में शामिल होते हैं। ऐसी जनश्रुति है कि वसन्त के आगमन पर कृष्ण ने राधा को रंगों से सराबोर किया था। राधा ने भी प्रतिउत्तर में कृष्ण को रंग लगाई थी। तब से ‘होली’ (रंगोत्सव) की शुरूआत हुई थी, ऐसी मान्यता है। यहीं से यह होली निकल कर देश के कोने-कोने तक पहुंची थी। अब तो विश्व के कोने-कोने तक पहुंचते चली जा रही है।

होली को लोग रंगोत्सव भी कहते हैं। अर्थात रंगों का त्योहार। रंग का यहाँ मतलब है आनन्द और जीवन में खुशी व उल्लास का आना। होली वसन्त क आगमन पर मनाया जाता है। समस्त ऋतुओं में वसन्त ऋतु को ऋतुओं का राजा कहा जाता है। बाग-बगीचों में हरियाली छाने लगती हैं। पेड़ों की टहनियों में नये-नये पत्ते आ जाते हैं। पुष्प खिल उठते हैं। मौसम में वसन्ती हवा बहने लगती है। गेहूँ के दाने गदराने लगते हैं। अर्थात फागुन का पूरा मास ही आनन्द और उल्लास पैदा करने वाला होता है। ईश्वर ने प्रकृति को विभिन्न रंगों से सजाया गया है ताकि लोग एक रस/रंग से बोर न हो। मनुष्य के जीवन के भी कई रंग हैं। जन्म के समय बालपन, जब वह अपने पैरों पर चलने लगता है, उसकी शरारतें भी परिवार के लोगों को कितनी खुशियाँ प्रदान करती है। वह बालक थोड़ा बड़ा होता है, उसे पाठशाला भेजते हैं और ज्ञान के रंग में डुबोते हैं। एक दिन युवा होकर वही बालक अपने श्रम की सिहाई से एक नये इतिहास की रचना करता है। मानवीय जीवन के इस विविध रूपों में ही जीवन का सार छुपा है। अनन्त काल से हम सब जन्म ले रहे और मृत्यु को प्राप्त कर रहे हैं। यह क्रम लगातार चलता आ रहा है। ना हम सब जन्म लेने से कतराते हैं और ना ही मृत्यु प्राप्त होने से घबराते हैं। सम्पूर्ण प्रकृति भी मनुष्य के समान ही हंसता, आनन्दित होता, मुस्कुराता और झर-झर रोता है। दुःख-सुख से परे होली जीवन में उत्साह और उमंग पैदा करता है। 

होली को लेकर कई गंभीर बातों की चर्चा पूर्व में की गई है, इसके साथ ही होली के हूड़दंग की चर्चा ना करूँ तो यह होली के साथ सरासर अन्याय करने जैसा होगा। होली सचमुच मिलने-मिलाने वाला त्योहार है। रंग तो सिर्फ प्रतिक है। होली पर पति-पत्नी एक-दूसरे के गालों में गुलाल लगाते हैं, अर्थात एक-दूसरे को गहराई से प्रेम करते हैं और जीवन में प्रेम, खुशी, उल्लास इसी तरह बना रहें का तथ्य छुपा है। पुत्र-पुत्री अपने माता-पिता, गुरुजन और रिश्तेदारों के पैरों में गुलाल अर्पित कर श्रेष्ठ जीवन का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। एक मित्र दूसरे मित्र को रंग-गुलाल लगाकर सदा-सदा मित्रता निभाने का वचन देते हैं। होली पर्व दुश्मनी भुलाने का भी पर्व है। इस दिन लोग वर्षों की दुश्मनी भूला कर साथ खातें हैं और एक-दूसरे को रंग-गुलाल लगाते हैं। 

भारत विभिन्न धर्मों, पंथों, विचारों और भाषाओं वाला देश है। होली मिलजुलकर रहने की सीख देती है। मुम्बई फिल्म नगरी की होली का उदाहरण सबों के सामने है। देश भर के विभिन्न धर्मों और भाषाओं के लोग इस फिल्म इंडस्ट्री की होली में शामिल होते हैं। होली के अवसर पर सभी भेदभाव को भुलाकर मिल-जुलकर होली खेलते हैं। आज की बदली परिस्थिति में इसकी बेहद जरूरत है। विश्व के कई देशों की कूदृष्टि भारत पर लगी है। वे हमारी एकता और अखण्डता को खंडित करना चाहते हैं। समय-समय पर वे कई तरह के साजिश रचते रहते हैं। हम सबों के मिल-जुलकर रहने की संस्कृति के कारण ही उन सबों के हर साजिश नाकाम हो जाते हैं।

होली पर देश भर के चैक-चैराहों पर होलिका दहन किये जाते हैं। जहाँ मुहल्ले के लोगों द्वारा लकड़ियाँ इकट्ठी की जाती है। घर के पकवान उसमें अर्पित किये जाते हैं। होलिका बुराई की प्रतिक है, उसकी प्रतिमा जलाई जाती है। भक्त प्रह्लाद सत्य के प्रतिक हैं, उसे होलिका के गोद से बाहर निकालकर उसकी पूजा करते हैं। वसन्त ऋतु के विभिन्न नये उपज को प्रज्ज्वलित अग्नि कुण्ड में सेंकते हैं और मिल बांटकर खाते हैं। इस अग्नि कुण्ड की अग्नि से लोग अपने-अपने घरों में चुल्हा जलाते हैं। इन तमाम परम्पराओं के पीछे उद्देश्य यह है कि हमारे जीवन में उत्साह, उमंग और उल्लास बना रहे। हम सबों में किसी भी तरह का कोई भेदभाव ना रहे। ना कोई बड़ा है, ना ही कोई छोटा रहे। सभी एक समान है। सब एक ईश्वर की संतान है। यह जीवन ईश्वर की देन है। सभी मिल-जुलकर रहे और मिल बांटकर खांयें। 


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