"प्रकृति की सीख"

बन ,बाग ,तालाब, खिले उपवन,

चंचल  बयार, चले मंद पवन|

नदियां गाती चले निज पथ पर,

अद्भुत प्रकृति का यह संगम |

गतिशील सभी है निज पथ पर,

सबको  सिखलाती यही सीख|

रुकना न कभी जीवन पथ पर,

देती प्रकृति भी यही सीख |

कांटों में खिला गुलाब तनकर,

खुशबू से भर देता  उपवन |

बहते झरने की धाराएं,

हैं राह बना लेती पथ पर|

देते हैं  मनुज को यही सीख,

हो धाराएं प्रतिकूल अगर|

हंसते गाते बढ़ते जाओ ,

एक दिन मंजिल आएगी नजर|

लेखिका /रचनाकार :रीता तिवारी "रीत"

मऊ ,उत्तर प्रदेश