स्वदेशी वैक्सीन और खेला होबे

बिस्तर पर पड़े दुःखी आत्मा ने सोचा,प्रधान सेवक जी ने तो कमाल कर दिया, सबसे पहले खुद ही स्वदेशी कोरोना वैक्सीन लगवाकर धमाल कर दिया।अब तो पूरे देश में स्वदेशी वैक्सीन लगवाने की होड़ लगी है और देश ही नहीं विदेशों में भी इस कोरोना वैक्सीन की धूम मची है।उन विरोधियों की बोलती बंद है जो प्रधान-सेवक जी को चैलेंज करते फिर रहे थे कि पहले ये खुद स्वदेशी वैक्सीन लगवाएं फिर जुमलेबाजी करें। अब उन परमज्ञानियों को इसमें भी राजनीति और पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव साधने की रणनीति नजर आ रही है।

कुछ को तकलीफ़ प्रधानसेवक जी से कम और मौसम से ज्यादा है।उनको लगता है यह बदलता हुआ मौसम तो कोरोना विशेष होगया है।मुंबई दिल्ली सहित और भी कई राज्यों में मच्छर के साथ-साथ कोरोना का खतरा भी बढ़ रहा है। जहां तक मौसम की बात है,रात में सोते समय कंबल ऊपर रहता है, और सोनेवाला कंबल के नीचे,मगर सुबह जागने पर कंबल नीचे रहता है और सोनेवाला कंबल के ऊपर।इसे कहते हैं मौसम का खेल।पंखा न चलाओ तो गर्मी और चलाओ तो ठंढ। मतलब पंखा भी चलाओ और कंबल भी ओढ़ो।मानो मौसम न हुआ चुनावी उलट-फेर हो गया।उस दिन भी चारो ओर बादल ऐसे घिर गए जैसे भयंकर जानमाल की हानि होने वाली है।कई लोगों को लगा चार-पांच दिनों की चक्रवाती मुसीबत आगयी। उन्होंने अपने कई कार्यक्रम स्थगित कर दिये।मगर हुआ क्या? किसी को भी स्पष्ट बहुमत न मिलने वाले चुनाव परिणाम की तरह ढाक के तीन पात।बस दो-चार बूंद टिपिर- टिपिर और थोड़ी बहुत आंधी-पानी।ऐसी धोखेबाजी तो भ्रष्ट पार्टियां भी नहीं करती। खैर-

कुछ लोग फेकूराम सरकार से इसलिए नाराज हैं क्योंकि पेट्रोल और डीजल दोनों ही जेब की बारह बजा रहे हैं।भला सौ रुपए लीटर पेट्रोल होना चाहिए क्या ? रसोई गैस की कीमत आसमान छूनी चाहिए क्या? गरीब का डीजल इतना महंगा होना चाहिए क्या? आम आदमी विरोधी ऐसी सरकार का हम विरोध करते हैं। मगर विरोध में करेंगे क्या? घोड़े पर बैठकर विधानसभा जाएंगे। गदहे पर बैठकर जुलूस निकालेंगे।रिक्शा पर बैठ विरोध का बाजा बजाएंगे। साईकिल जुलूस निकालेंगे।प्रातःभ्रमण के समय भले ही लंबी तानकर सोये रहें,मगर प्रधान सेवक की सरकार की ऐसी-तैसी पैदल-यात्रा निकालकर ही करेंगे।पार्टी विशेष के ये गदहे-घोडे़ आजकल जागरूक जनतंत्र के प्रतीक बन गये हैं। कबाड़ में पड़ी रहनेवाली साईकिल लोकतंत्र की मशाल बन गयी है। उपेक्षा और भुखमरी की मार झेलनेवाला रिक्शा संविधान की पुकार बन गया है।

कुछ तो अब भी किसान आंदोलन की डुगडुगी बजा रहे हैं।उनको लगता है आंदोलन की धकापेल में पस्त पड़ा जमूरा डुगडुगी सुनकर एकबार फिर उठ खड़ा होगा। गिरकर उठने वाला ही विजेता होता है, और हारकर जीतने वाला ही सिकंदर।मगर विडंबना यह है कि दूसरे की बंदूक अपने कंधे पर रखकर चलाने वाले सिकंदर का कंधा पूरी तरह कमजोर हो चुका है।अब यह किसान आंदोलन की पत्तल परोस नहीं, समेट रहा है। मामला सम्मानजनक वापसी का है। आंदोलन और उनके नेताओं की नाक पूरी तरह कटने से बच जाए, बात यहां आकर टिक गयी है।

आलोचनाओं के बीच प्रधान सेवक वाली सरकार ने मुफ्त कोरोना वैक्सीन क्या निकाल दी, अपनी भरपूर वाहवाही करवा ली।दारू पी-पीकर सरकार की ऐसी-तैसी करने वाले भी, फ्री वाली वैक्सीन का मजा ले-लेकर अपनी इम्यूनिटी बढ़ा रहे हैं और सोशल मीडिया पर फोटो पोस्ट कर 'कर्मवीर' बने फिर रहे हैं। राष्ट्रवादियों की इम्युनिटी तो यूं ही बढ़ी हुई है।वे कहते फिर रहे हैं, कश्मीर को भारत में पूरी तरह मिलाने की बात की थी, मिलाकर दिखा दिया। अयोध्या में राममंदिर निर्माण की बात की थी वह भी पूरी हो गयी।अब तोआगे की तैयारी है, मथुरा काशी की बारी है।

बहुत खूब, राष्ट्रवादियों ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के नाम पर भरपूर धन संग्रह किया, निर्माण में होने वाले खर्च से भी डेढ़ गुना ज्यादा। है न चमत्कार ? सबसे बड़ी बात है,उन नेताओं ने भी चंदा दिया जो प्रधानसेवक को लोकतंत्र का दुश्मन नंबर वन बताते हैं और उसे हिटलर तथा फेकूराम कहकर कोसते रहते हैं।इसे कहते हैं असली खेल, दुनिया के सबसे बड़े धन संग्रह का खेल।अंदर की बात तो यह है कि यह धन-संग्रह का नहीं जन-संग्रह का खेल था।इसी बहाने राष्ट्रवादियों ने अपने सदस्यों की संख्या भी बढ़ा ली और ताकत भी।

खेल की बात मन में उठते ही दुखी आत्मा का ध्यान दीदी की 'खेला होबे' की ओर चला गया।उनको लगा राजनीति के गलियारे में सभी इसका अपने-अपने ढंग से अर्थ निकाल रहे हैं।कुछ को लगता है,बंगाल विधानसभा चुनाव में,चुनाव कम और हिंसा ज्यादा होगी।कई सोच रहे हैं कि नये समीकरण तैयार होंगे।मगर यहां तो तीसरा ही खेला हो गया। दीदी टांग तुड़वाकर घायल शेरनी बन बैठी।कुछ को लगता है शेरनी नहीं,नागिन बन बैठी।मगर दीदी व्हीलचेयर पर बैठ कर चुनाव प्रचार करते हुए भीगी बिल्ली ज्यादा लग रही है।खेला होबे का कहीं यही अर्थ तो नहीं? बंगाल की घायल बेटी के नाम पर सहानुभूति वोट बटोर लिया जाय ,क्या यही है खेला होबे ?

ह्वाट्स ऐप यूनिवर्सिटी के कमल शिक्षण संस्थान से जारी दीदी की दो तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं,एक में दीदी अस्पताल के बेड पर पड़ी हुई हैं और उनके बाएं पैर में पट्टी बंधी हुई है। दूसरी तस्वीर में दीदी व्हीलचेयर पर बैठकर चुनाव प्रचार कर रही हैं और पट्टी उनके बाएं पैर की जगह दाएं पैर में बंधी है।इसे कहते हैं बंगाल का जादू,असली खेल। राजनीति के पंडितों और बुद्धिजीवियों को लगता है सत्य, वास्तविकता और यथार्थ का यह खेल चुनाव होने तक खूब चलेगा। उसके बाद राम और रहीम साथ बैठकर एक ही ग्लास में पानी पीयेगें और दारू भी।मगर सोचने वाली बात यह है कि अब तो दस-बारह साल के नाबालिग बच्चे भी बीच सड़क में ट्रैफिक जाम कर नमाज पढ़ने लगे हैं।क्या यह भी एक तरह की गंगा-जमुनी तहजीब वाली होली है?

तभी श्रीमती जी ने भीतर वाले कमरे में आकर दुखी आत्मा से कहा, " चलिए उठिए ,महाकवि महोदय आपसे मिलने आये हुए हैं। और हां, उनके हाथ में रंग और अबीर की थैली भी है।"

दुखीआत्मा जितने खुश हुए, उससे ज्यादा यह सोचकर दुखी हो गए कि महाकवि जी के हाथ में रंग और अबीर की थैली है। उन्होंने उबासी लेते हुए कहा-"इस परमज्ञानी ने कहीं से सम्मान झटक लिया है और अब उसी खुशी में घर-घर जाकर होली खेलने के बहाने सम्मान-कथा सुनाते फिर रहे हैं। गौर करनेवाली बात यह है कि उनके हाथ में मिठाई का डिब्बा है कि नहीं?"

श्रीमती जी ने आंखें तरेरते हुए कहा "बहुत हल्की बात कर रहे हैं आप , मित्रों के लिए ऐसी घटिया सोच ठीक नहीं।"और फिर वे दुखी आत्मा के सर के नीचे से तकिया खींच उन्हें बिस्तर से धकियाने लगीं।दुखी आत्मा को और ज्यादा दुखी होने के लिए इतना ही काफी था।

प्रेषक -अजय कुमार प्रजापति

कवि कथाकार व्यंग्यकार

साहित्य संपादक इस्पात भारती मासिक पत्रिका

मोबाइल नंबर-९३७३५५६४८६ , ९४३१७६४९२१

झारखंड