"फागुन मास पिया नहीं पास"

फागुन मास पिया नहीं पास

प्रेम-प्यार सब ..लगे बकवास।


किस संग खेलूँ प्रीति की होली

वैरी लागे सब हमजोली....।

कंगन-बिछिया पायल बोली

पिय बिन अधूरा सब श्रृंगार,

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास...।


गीत मादकता के कोयल गाये

भौंरा हर पल नेह लड़ाये....

पी पराग अल्हड़़ बदमास,

कलियों से करता परिहास, 

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास


कितना भी रस मनमे घोँलूँ

प्रेम पिचकारी सरब अंग धोलूँ

चंगिया चोली करती पुकार..

किस संग बोलो फागुन खेलूँ,


तुम बिन मोहन है दिल उदास।

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास।।


टेसू-पलाश मौसम मे बिखरे

मादक बसन्त सबके हिय हरषे

सखियाँ डूबी रंग रंगोली.. 

करती इत उत हँसी ठिठोली 

भीगी सबकी अँगियाँ चोली,


तुम बिन ये कैसा मधुमास।

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास।।


सौतन मुरली तान सुनाये....

रात-रात मोरा हिय झरसाये

पिया नहीं आये पिया नहीं आये

सौतन.. पगली कहके बुलाये


दूर करो इसका उपहास.. ।

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास।।


प्रीत के रंग रंगी राधा प्यारी 

मोहन तुमपे तन मन वारी...

मन बसन्त हुआ तन पलाश..

धरती भी कर ली सोलह श्रृंगार ,


सुनलो अब दिल की अरदास।

प्रेम-प्यार सब लगे बकवास ।।


किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा"

नोयडा