"शहीद दिवस पर आज़ादी के दीवानों को सौ सलाम"

तलवारों पर सर रखें और अंगारों में तन जलाए उन शहीदों ने देश की ख़ातिर फ़ना खुद को करवाया तब जाकर आज हमने ये आज़ाद गगन को पाया है। 

ऐसे वतनपरस्ती की मिसाल आज़ादी के आसमान के चमकते तीन सितारें अमर शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को सौ सलाम।

उनके बेखौफ़ और वीरता सभर चरित्रों को हम बस याद ही कर सकते है कि ऐसे मानव भी इस दुनिया में हुए हैं, जिनके कार्य, आचार-विचार और कुर्बानी किंवदंती हैं। भगतसिंह ने अपने अति संक्षिप्त जीवन में वैचारिक क्रांति की जो मशाल जलाई, उनके बाद अब किसीके बस की बात नहीं। बेशक हम चाहते है कि हर बेटा उनके जैसा बने पर वो हमारा नहीं किसी और का बनें कोई नहीं चाहता देश की ख़ातिर  बेटों का बलिदान देना।

2 साल जेल प्रवास के दौरान भी भगतसिंह क्रांतिकारी गतिविधियों से भी जुड़े रहे और लेखन भी जारी रखा। फांसी पर जाने से पहले भी वह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे। 23 मार्च 1931 को शाम 7.23 पर भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को फांसी दे दी गई।

भगतसिंह और सुखदेव के परिवार लायलपुर में पास-पास ही रहने से इन दोनों वीरों में गहरी दोस्ती थी, साथ ही दोनों लाहौर नेशनल कॉलेज के छात्र थे। सांडर्स हत्याकांड में इन्होंने भगतसिंह तथा राजगुरु का साथ दिया था।

पुलिस की पिटाई से लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए राजगुरु ने 19 दिसंबर, 1928 को भगत सिंह के साथ मिलकर लाहौर में अंग्रेज सहायक पुलिस अधीक्षक जेपी सांडर्स को गोली मार दी थी और खुद ही गिरफ्तार हो गए थे। कुछ इंसान मरते है पर उनके विचार नहीं। आज भी शहीद शब्द कानों में पड़ते ही ये तीन नाम गूँजने लगते है हमारे दिमाग की संदूक में। दुनिया की हर शैय का पतन हो जाता है लेकिन सुविचार हमेशा जीवित रहते हैं। शहीद दिन पर बहरे हो चुके लोगों को और आजकल की पीढ़ी जिनको आज़ादी के असली मायने मालूम ही नहीं उनको ऊंची आवाज में शहीदों की कुर्बानी के किस्से सुनाने जरूरी है। आज की पीढ़ी के लिए जानना जरूरी है कि राष्ट्र के प्रति हर नागरिक का फ़र्ज़ बनता है जिसे त्याग और समर्पण से निभाया जा सकता है। माँ धरती का कर्ज़ चुकाने कि ख़ातिर अपना फ़र्ज़ निभाते आज़ादी की चिंगारी ने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के तन बदन में ऐसी आग लगाई कि इन्कलाब की ज्वालाएँ और वतन परस्ती की तमन्ना को कफ़न बनाकर ओढ़ लिया और मौत को जश्न बना लिया।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु