पापा

 जब से तुम चले गए,

मेरे लिये बाजार के 
हर खिलौने महँगे हो गए,
धूप भी अब ज्यादा तेज़ हो गयी
जब से हाँथ सर से 
तुम्हारा हट गया,
दुःखों में भी कैसे मुस्कुराए 
ये सलीक़े भी तुम संग ले चले गए,
रोटी कपड़े तक जीवन सिमट गया 
शौक़ भी सब मर गए,
तुम्हारे जाते ही 
अपनो ने इतना सताया, 
हम ढूंढ रहे है साया तुम्हारा 
बोलो तुम किस ओर किधर गए,
मैं जानती तो थी कि एक दिन 
हम तुम बिछड़ जाएंगे,
पर दुःख इतना ही है वक़्त से पहले 
हाँथ छुड़ाकर तुम चले गए।

डिम्पल राकेश तिवारी,वरिष्ठ साहित्यकार 
अवध यूनिवर्सिटी चौराहा-अयोध्या,उत्तर प्रदेश