..आंखों में मनुहार की भाषा

आजाओ न फ़ागुन में ,

नवयौवन सा श्रृंगार , 
तुम्हारा , आँखों मे ,
मनुहार की भाषा , 
तुम अलसाई , 
भारी मेरी सांसों पर ,
मैं मतवाला फ़ागुन में ,
मृगनयन सी आंखें ,
तुम अलबेली सी , 
जैसे ,महुवे की मदिरा , 
रंग बिरंगा मौसम , 
सजें हैं टेसू.केसरिया , से,
सूंदर सुंदर  प्यारे प्यारे,
देखो न तुम फ़ागुन में , 
गीत मधुर से मैं भी गाउँ , 
नाचूँ कुदूँ, हो जाऊं ,
मदहोश ,मैं भी क्यों न,
बसन्त महकता,
मकरंद की आवाज़ें , 
रूठो न मुश्ताक़ , ऐसे,
तुम भी फ़ागुन में ,

. मुश्ताक़ अहनद शाह
सहज़।  हरदा
मध्यप्रदेश