होली के दोहे

नैना रतनारे हुये, अधर रसीले लाल ।

छुईमुई गोरी हुई ,हुये गुलाबी गाल ।


फागुन में हैं फाग के, रचे अनूठे छंद ।

भ्रमर कली का पी रहे, मंद-मंद मकरंद।

 

करे पवन अठखेलियाँ, कोयल गाये फाग।

होली के त्योहार में, फैला है अनुराग ।


आँखें पिचकारी हुईं, छोड़ें रस की धार ।

अधर रसीले बोलते, बातें लच्छे दार ।


होली है सौहार्द का, और प्रेम का पर्व ।

भारतीय इस पर्व पर, हमें सदा है गर्व ।


रस के गुब्बारे हुये, फूले-फूले गाल ।

आँखें रसवंती हुईं, अधर हुये बाचाल ।


फूलों का रस घोल कर, मिला प्रीत का रंग।

गोरी डालै प्रेम से, मन में उठी तरंग ।


कलियों की पाँखें खुलीं, अति कोमल सुकमार।

भौंरों से हैं हो गईं, उनकी आँखें चार ।


नव उमंग उत्साह का, यह पावन त्योहार ।

भाई चारा प्रेम का,  करता है संचार ।


खुशियाँ बन कर उड़ रहा, रंग अबीर गुलाल।

मौसम भी नटखट हुआ, पल-पल करे बबाल ।


तन-मन में है प्रेम की, जागी नई उमंग ।

अंग-अंग में खिल उठे, इन्द्रधनुष के रंग ।


श्याम सुन्दर श्रीवास्तव 'कोमल'

व्याख्याता-हिन्दी

अशोक उ०मा०विद्यालय, लहार

मो०- 8839010923

 komalsir17@gmail.com