बस यूँ ही 12

मुस्कुराहटें न बिकती हैँ न खरीदी जाती हैँ
मुस्कुराहटें निष्कपट ही पसंद की जाती हैँ
कहते हैँ सभी बच्चे ईश्वर का रूप होते हैँ
भेदभाव क्या होता है इससे वे दूर होते हैँ ।।
जब कभी आधुनिकता शांति नहीं देती
तब काली परछाई मन को अच्छी लगती
जब नकली जीवन शैली शांति नहीं देती
तब हरियाली अपनी ओर खींचने लगती ।।
सृष्टि कहती नारी श्रद्धा थी है और श्रद्धा रहेगी
आजाद होकर भी समर्पित नारी परतंत्र रहेगी
औरों के लिए खुद को मढ़ती जिम्मेदारियों में
देखा प्रेम त्याग भी भरा है कितना नारियों में ।।
पतझड़ तो मौसम में आता यह प्रकृति है
प्रकृति का नियम है प्रकृति ईश्वरीय प्रदत्त है
रिश्ते मनुष्य बनाया करता नहीं प्रकृति है
रिश्ते खुद बनाये रखें क्योंकि ये स्वयं प्रदत्त है ।।
उत्तर प्रदेशीय संतोष आनंद गीतकार हुआ
वक्त बदला जिंदगी से आनंद निकल गया
प्यार,बिछड़ना लिखा सबका मनोरंजन हुआ
जिसके हक़दार थे न मिला यह क्या हो गया ।।
ये गलियां ये चौबारा एक प्यार का नगमा है
रंग जमा दिया संतोष आनंद ने फिल्मों में
उस रंग से आज भी लोग कमा रहे पैसा हैँ
फिर क्यों आनंद की बॉलीवुड से दूरियां हैँ ।।
भावनाओं में बहकर यदि कोई मदद करे
क्यों ऐसे लोगों पर सबाल उठने चाहिए
यदि मदद के नाम पर जो अपना पेट भरे
फिर उनके लिए प्रश्न पत्र ही होना चाहिए ।।
काले अँधेरे टिकते नहीं कभी उजालों के सामने
उजले उजाले कहीं जाते नहीं जाते आराम करने
आखिर क्यों डरें अंधेरों से नियमित हम हैँ देखते
नियम रात्रि बाद सूरज अँधेरी बाद पूनम आते हुए ।।
प्रथमा हो या चाहे हो पूर्णमासी का दिन
मन स्वच्छ हो अच्छा सोचें हर एक दिन
पूर्णिमा महिमा का जो कोई आनंद लेना
रोशनी बाद पहले सकारात्मक सोच लेना ।।
रंगों को ही अपना रंग कहाँ पता होता है
इंसानों को अपना रंग कब खबर होता है
शायद यूँ आईना देखना जरुरी होता है
नजर के साथ सही नज़रिया जरुरी होता है ।।
ऐसा भी कितनी बार कितनी बस्तुएँ
लगता है कि हमसे दूर चली गयीं हैँ
पर महक और सुन्दर वातावरण में
वस्तुएं चुपके से करती आक्रमण हैँ ।।
चाँद को कुछ पता नहीं कौन क्या कहता है
किसी को दाग दिखता कोई उपमा करता है
नित्य परिवर्तित अँधेरे में भी खुश रहता है
कि सीखा न उससे हमने यही दुख रहता है ।।
सूरज सिर्फ तपन ही नहीं देता मानव को
कितना कुछ ही दे देता है सूरज मानव को
धूप और तपन तो जल्दी सोच लेते हैँ सब
पानी भी देता है सोचने में लगता है वक्त ।।

पूनम पाठक