न रहे अब वो

न रहे अब वो
खेल खिलौने
न रही मिट्टी की
वो सौंधी सौंधी महक
न ही रहा रिश्तों में
वो प्यार , वो अपनापन
न कोई संग बैठे
करे दो बात हँस कर
न कोई पूछे हाल दिल का
न रखे कोई मरहम दुःखों पर
हर कोई है बस मग्न
अपनी ही धुन में
चाहिए सबको आज़ादी
अकेलापन ,अपना अपना घर
हो गए रिश्ते यूँ भारी इतने
निभे न निभे किसी से
ऐसे में खोया ,उलझा सा
पराया हुआ बचपन
हो कैद आधुनिक जीवनशैली
में
न रहे अब वो खेल खिलौने
जो बनाते थे मिट्टी से
न वो गुडे गुड़ियों के खेल
न घर घर , न फूल पत्तियों से
खाना परोसना अपने छोटे छोटे बर्तनों में
फिर चटकारे लेना
छोटी छोटी टहनियों
पर बांध धागा धनुष बनाना
और फिर कोई भी लकड़ी
ले निशाना साधना
देख फलों से लदे पेड़ों को
कितने सुखद प्यारे प्यारे
पल थे वो मासूम बचपन के
जो अब लुप्त हुआ सिमट तन्हा दीवारों के बीच।।

......मीनाक्षी सुकुमारन
नोएडा