मेरे सब्र को रुसवा न कर,,,,,,,,

आज उसकी महफ़िल
में आ गया हूं मैं,
बातें आँखों आंखों में
ही कर गया हूं मैं,
हर वक़्त साथ रहा मेरे
करता था अजनबी,
बीते लम्हों में नाहक़ ही
उलझ रहा हूँ मैं,
मां के दुपट्टे से लिपट कर
अब नहीं रोता,
दर्द की इंतहा ए मां अब
समझ गया हूँ मैं,
घूमने फ़िरने की फुरसत
अब कहाँ मुझकों,
मसाइलों में ही अपने हां
उलझ गया हूं मैं,
मेरे सब्र को रुसवा न कर
दूर रह" मुश्ताक़,"
मुरीद हूं तेरा मगर सिजरा
बदल रहा हूं मैं,

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
"सहज़"
हरदा मध्यप्रदेश,,,,,,