सच्ची मित्रता


राकेश प्राथमिक विद्यालय नारायन पुर में सहायक अध्यापक के पद पर 2009 से तैनात थे। विभाग में हेड मास्टर के पद कम हो जाने के कारण प्रोमोशन को तरस रहे थे। हालांकि दस साल तक  एक ही पद पर बने रहने का इंक्रीमेंट वे ले चुके थे लेकिन हैडमास्टर के पद का अपना अलग रुतबा होता है।

वे अपने परम मित्र गिरधर को अपने सहायक अध्यापकों से रौब गांठते देखा करते थे। राकेश और गिरधर बचपन के मित्र थे।दोनों की नौकरी भी साथ साथ लगी थी ।फर्क सिर्फ इतना था कि गिरथर को नौकरी अपने गृह जनपद में लगी और राकेश की अन्य जनपद में।बहराल राकेश भी ट्रांसफर के बाद अपने गृह  जनपद में आ गया था  । लेकिन अपनी   वरिष्ठता को खो  कर।यही कारण था कि गिरधर को प्रोमोशन मिला और राकेश को नही मिला।

राकेश के विद्यालय की हालत खस्ता थी।93 बच्चे नामांकित थे। लगभग 60  बच्चे प्रतिदिन आते थे। राकेश ही उस विद्यालय में तैनात थे।

स्कूल का सारा काम देखना पड़ता था । हम यह भी कह सकतें है।कि वो ही चपरासी थे वो ही प्रधानाध्यापकऔर वो ही अध्यापक  । मध्याह्न भोजन की प्रतिदिन व्यवस्था करना ।जूता मोंजा ,स्वेटर ,ड्रेस , आयरन गोली,पेट के कीड़े मारने की गोली,बेग ,किताबें बांटना भी उन्ही के जिम्मे था।और इन सभी का रिकॉर्ड बनाना कोई आसान काम नही था।पूरे कार्य दिवस में लिखा पढ़ी ही करते रहते थे। 

प्रतिदिन बच्चों को पढ़ाना नही भूलते थे। परंतु उतना समय नही दे पाते थे।  बच्चे स्कूल तो पढ़ने आते थे परंतु खेलते अधिक थे। स्कूल की दशा खराब होती जा रही थी। संख्या भी कम होने लगी थी।जिन अभिभावकों के के पास प्राइवेट स्कूल की फीस चुकाने के पैसे थे ।उनके बच्चे प्राइवेट स्कूल में जाने लगे थे। उनको यह लगने लगा था कि अब स्कूल के  हालात अब सुधरने वाले नही है।

अब स्कूल में गरीबी मज़दूरों के बच्चे ही रह गए थे।राकेश के अंदर की आत्मा कचोट रही थी कि वह उतना बच्चों को नही दे पा रहा हैं  जितना वह चाहते है। अमीरों के बच्चे तो किसी न किसी तरह पढ़ लिख जाएंगे परंतु इन  गरीब बच्चों का क्या होगा ?अगर मैने इनका ध्यान नही रखा तो ये बच्चे अनपढ़ रह जाएंगे।

मासिक मीटिंग के दौरान उसने अपनी व्यथा अपने मित्र गिरधर को सुना दी।गिरधर भी उसी न्यायपंचायत के विद्यालय में हेड मास्टर थे जिस न्यायपंचायत में राकेश  अध्यापक थे।

गिरधर बोले,"इस समस्या का समाधान एक हो सकता है।"

 राकेश, उछल पढ़े,"वह कैसे?"

"मेरे विद्यालय में 4 का स्टाफ है अगर चाहो तो मेरे एक स्टाफ की ड्यूटी अपने विद्यालय में लगवा लो।"गिरधर ने प्रस्ताव रखा।

 राकेश बोले,"इसके लिए तो अधिकारी से आदेश करना पड़ेगा।'

गिरधर बोले"सो तो है। कल रविवार है ।साहब के घर चलते है वे ही इस समस्या का समाधान करेगे।"

अगले दिन सुबह गिरधर और राकेश आठ बजे ही  साहब के घर मे जा धमके। नौकर ने बताया साहब सो रहे है।एक घंटे बाद साहब  बाहर आये।गिरधर में अपने मित्र की समस्या सामने रख दी।

साहब बोले," मैं आपकी समस्या के भलीभाँति अवगत हूँ।  परंतु में एक दो  दिन की  अल्पकालिक व्यवस्था के तौर पर आपके स्कूल में अन्य अध्यापक को भेज सकता हूँ परंतु लंबे समय के लिये अध्यापक की ड्यूटी लगाना मेरे अधिकार क्षेत्र  में नही है।मैंने आपके विद्यालय का नाम नोट कर लिया है।नई नियुक्ति में अथवा समायोजन में मैं  आपके विद्यालय में अध्यापक की  व्यवस्था करता हूँ।,"

दोनों लोग निराश होकर घर की ओर चल पड़े। "जाने कब समायोजन या नई नियुक्ति का आदेश आएगा और जाने कब मेरे स्कूल की दशा सुधरेगी"मन ही मन राकेश बुदबुदाए जा रहा था।

अगले दिन राकेश अपने स्कूल के कार्य मे तल्लीन हो  गए परंतु गिरधर के मन मे अभी भी अपने मित्र की समस्या हिलोरे मार रही थी।गिरधर का स्टाफ बहुत सहयोग करने वाला था।

उसके स्टाफ में हर एक  टीचर  किसी ना किसी क्षेत्र में विशेष योग्यता रखता था।कोई आर्ट में होशियार था तो  कोई खेल में निपुण।

गिरधर ने योग्यता के हिसाब से  सभी लोगो के काम बांट रखे थे।

अध्यापिका रेखा कक्षा 1 ,2 को देखती थी।और बच्चों को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बच्चों को प्रतिभाग कराती थी।

 दूसरी  अध्यापिका राखी अपने विषय के शिक्षण के अतिरिक्त  नन्ही मुन्नी बच्चियों को आर्ट संबंधी अन्य क्रिया कलाप जैसे  रंगोली बनाना,मिट्टी के खिलौने बनाना ,सिखाती थी।

तीसरे अध्यापक रवि  गणित विज्ञान के अतिरिक्त शारीरिक व्यायाम संबंधित क्रिया कलाप जैसे पीटी  खेल आदि खिलाते थे।

गिरधर लिखा पढ़ी के काम के अलावा संस्कृत  सामाजिक विषय,और अंग्रेजी देखते थे।

इंटरवल में जब सभी स्टाफ़ एकत्रित हुआ तो उन्होंने अपने मित्र राकेश की पीड़ा बताई।

रवि बोले,"इस समस्य को तो आसानी से हल किया जा सकता है।,"

"वो कैसे"गिरधर बोले।

रवि-""हम आप  मध्यावकाश में फ्री  रहते है।हम  सभी लोग   उनकी कागजी लिखा पढ़ी पूरी करतें रहेंगे।और आप उनके स्कूल  की  पुताई सहित अन्य काम मे मदद करते रहे,' सभी लोग रवि की बात से सहमत ही गए थे।

 अगले दिन सभी लोगों ने अपने विद्यालय के अतिरिक्त राकेश के विद्यालय का काम भी बांट लिया।और  राकेश को विद्यालय की गुणवत्ता बढ़ाने के लिये छोड़ दिया।

फिर क्या था राकेश ने जी जान लगा दी।नामांकन धीरे धीरे बढ़ रहा था 6 माह के अंदर राकेश का विद्यालय भी गिरधर के विद्यालय के साथ आदर्श विद्यालयों में गिना जाने लगा ।

तभी समायोजन में दो अध्यापक आ गए थे।

गिरधर और राकेश की मित्रता के चर्चे पूरे ब्लॉक में फैल गए थे।

डॉ० कमलेंद्र कुमार श्रीवास्तव

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