कुछ रिश्ते स्वाभाविक बन जाते हैं

बात उन दिनों की है तब मैं छोटी थी!
हमारे मायके में एक काम करने वाली विधवा औरत आती थी, वो अकेले ही अपना जीवन यापन करती थी! उनका पति और पुत्रों का देहांत हो चुका था! शायद इसी कारण उनका मानसिक संतुलन कुछ ठीक नहीं है! घर का सारा काम तो ठीक-ठाक कर लेती है पर उन्हें कुछ ज्यादा ही बोलने की आदत है अकारण हीं दिनभर बुदबूदाते रहती है परंतु उनका मन बहुत अच्छा है! भले ही वो बात बात पर गुस्सा करें दिन भर बुदबूदाते रहे पर मुझसे वह बहुत प्रेम करती है! बचपन से ही उनका मुझसे और मेरा उनसे एक अलग ही लगाव होता गया! कुछ वर्षों तक हमारे घर में वह काम की उसके बाद किसी कारणवश वो काम छोड़ दी! कुछ वर्षों बाद मैं बड़ी हुई मेरी शादी पास में ही हुई ! संयोगवश मेरा घर उनके घर के पास ही हुआ! शादी के बाद भी वह मेरे घर रोज आने लगी, मन हुआ तो कुछ काम कर देती नहीं मन हुआ तो बैठकर tv देखती चाय पीती और फिर अपने घर चली जाती!
प्रति दिन मेरे घर आना उनका जैसे दैनिक चर्या में शामिल हो चुका था और यह सिलसिला आज भी चल रहा है! मेरे शादी के बाद बच्चे हुए, कभी-कभी मैं बीमार भी पर जाती थी! वो मुझसे बिन कुछ कहे उनसे जो भी बन पाता घर का काम कर देती! कभी काम का पैसे भी नहीं मांगती मुझसे! वो बूढ़ी है गरीब है परंतु स्वाभिमानी जरूर है! वृद्धा पेंशन और कभी किसी के घर का काम करके अपना गुजारा कर लेती परंतु किसी के सामने कभी हाथ नहीं फैलाती! उन्हें हम लोग मामी कह कर बुलाते हैं, मेरी बेटियाँ दादी कह कर बुलाती है! प्रतिदिन उनका आना बिन कुछ कहे ही कुछ ना कुछ काम कर जाना और मेरे बीमार रहने पर मेरा देखभाल करना यह सब कुछ अनकहे रिश्तो का अहसास है! वो मेरी माँ तो नहीं पर माँ जैसी ही है! वो किसी के घर जाए या ना जाए पर मेरे घर प्रतिदिन उनको आना ही है!वो नहीं आती है तो ना उनका मन लगता और ना ही मेरा मन लगता है! उनसे जैसे एक रिश्ता ही बन गया है! इस जन्म में तो अपना रिश्ता नहीं शायद पिछले जन्म में उनसे मेरा कोई रिश्ता जरूर रहा होगा! सच ही कहा है किसी ने.... जरूरी नहीं कि खून के रिश्ते ही अपने हो ....कुछ रिश्ते स्वाभाविक बन जाते हैं!

अनुपमा अधिकारी✍️ , किशनगंज ( बिहार )