दो साल की जिंदगी

लिफ्रट से निकल कर राधिका सीधे डा0 मेहता के कंसल्टिंग रूम में पहुंची। वहां उसे एक अलग तरह की शांति का अनुभव हो रहा था। बीच-बीच में बजने वाले फोन की आवाज के अलावा वहां किसी अन्य तरह की आवाज नहीं आ रही थी। शहर में पली-बढ़ी राधिका को अन्य शौक के अलावा छोटी-छोटी कहानियां लिखने में बड़ा आनंद आता था। लेकिन इधर तीन महीने से सिर में होने वाले दर्द से वह काफी परेशान थी। फैमिली डाक्टर के कहने पर वह दिमाग का सीटी स्कैन कराने डा0 मेहता के अस्पताल आई थी। इस समय वह डा0 मेहता का इंतजार कर रही थी। उसकी स्कैनिंग की रिपोर्ट आने वाली थी। इसलिए वह थोड़ा डरी हुई थी। मन में काफी बेचैनी महसूस हो रही थी।

लगभग पौन घंटे बाद राधिका से पहले आए रोगियों को देखने के बाद राधिका का नंबर आया तो डा0 मेहता ने पहले उसे गौर से देखा। वह उसकी रिपोर्ट पहले ही देख चूके थे। उन्होने उसे उसी तरह गौर से देखते हुए कहा, ‘‘आपके छोटे दिमाग के पीछे एक गांठ है, जो जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन परेशान होने की जरूरत नहीं है। इसे ऑपरेशन से निकाला जा सकता है। उसके बाद आपको कोई खतरा नहीं होगा।’’

‘‘मेरे पास कितना समय है डाक्टर साहब?’’ राधिका ने पूछा।  काफी सोचने विचारने के बाद राधिका ने बस यही एक सवाल किया था।

‘‘ज्यादा से ज्यादा दो साल।’’ डाक्टर ने कहा।

राधिका की अब जैसे सोचने-समझने की शक्ति ही खत्म हो चुकी थी। शून्यता के साथ वह घर के लिए निकल पड़ी। वह खुद को स्वस्थ रखने की कोशिश कर रही थी, जिससे उसके मां-बाप को अधिक चिंता न हो। पर जब मां-बाप ने उसकी बीमारी के बारे में सुना तो उनका कलेजा मुंह को आ गया। उन्होंने राधिका को ऑपरेशन कराने के लिए बहुत समझाया, पर वह ऑपरेशन के लिए राजी नहीं हुई। 

राधिका ने जीवन के इन दो सालों को अच्छी  तरह जीने का निर्धारण कर वह अपने नए-नए शौक पूरे करने में समय बिताने लगी। लगभग डेढ़ साल में उसने तीन किताबें लिख डालीं। इनमें लिखी कहानियों में उसके दिल की आवाज, मन की उमंगें और आनंद भरी थीं। शायद इसीलिए उसकी गिनती उभरती लेखिकाओं में होने लगी। परंतु उसके दिल के इस आनंद के साथ-साथ ट्यूमर का दर्द भी बढ़ता जा रहा था। आखिर राधिका ने ऑपरेशन कराने का निश्चय कर लिया। सौभाग्य से उसका ऑपरेशन सफल हो गया और जल्दी ही उसे दर्द से आराम मिल गया।

ऑपरेशन के बाद भी राधिका कहानियां लिखती रही। चालीस साल बाद भी राधिका इस घटना को याद करती है तो उसे काफी संतोष मिलता है। लगभग 66 साल की उम्र में राधिका की मौत हो जाती है। अपनी पूरी जिंदगी साहित्य की सेवा में गुजारने वाली राधिका अपने इस शौक को अंत तक पाले रही। लगभग डेढ दर्जन कहानी संग्रह और लगभग इतने ही उपन्यास लिखने वाली राधिका की श्रेष्ठ कृतियां वही मानी गईं, जो उसने उन दो सालों में लिखी थीं। उन दो सालों को राधिका ने जिंदगी के अंतिम साल मान कर बिताए थे। जिन्हें उसने अपनी कहानियों में उतार दिया था।

मरने के लिए भी सचमुच बड़े हिम्मत की जरूरत है। यह मानने वाला भी यह मानने लगता है कि जीने के लिए उससे भी अधिक हिम्मत की जरूरत है। मरने के बाद राधिका को साहित्यरत्न से नवाजा गया। उसकी सारी रचनाएं एक संग्रह के रूप में इकट्ठा की गई हैं। जिसका नाम दिया गया है 'दो साल की जिंदगी'। कहने की जरूरत नहीं है कि वे वही रचनाएं है, जो उसने अपनी जिंदगी के अंतिम साल मान कर आज से चालीस साल पहले लिखी थीं।


वीरेन्द्र बहादुर सिंह

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