काश कि

काश कि वो मुझको समझ पाते
तो यूं मुझसे रिश्ता न छुड़ाते।
प्रेम नहीं वो भक्ति है मेरी
राधा सी प्रीत नहीं
शबरी सी प्रतीक्षा है मेरी,
काशमेरे अंतस की पवित्रता को जान पाते
तो यूं मुझसे रिश्ता नहीं छुड़ाते।
समर्पित भाव से हर
शब्द किया अर्पित
शब्द पूजा से
किया अलंकृत
काश शब्दों की मेरी पवित्रता को समझ पाते
तो यूं मुझसे रिश्ता नहीं छुड़ाते।
अब न आस है कोई
न विश्वास है कोई
काश मेरी भावनाओं की पवित्रता को पढ़ पाते
तो यूं मुझसे रिश्ता नहीं छुड़ाते।
धधकता न दिल मेरा
अनवरत आंसू न बहाते
काश कृष्ण की तरह वो मेरे सखा बन जाते
तो यूं मुझसे रिश्ता नहीं छुड़ाते।

गरिमा राकेश गौतम
कोटा राजस्थान