तीनों ‘‘काले कृषि कानून’’ वापस लें प्रधानमंत्री: प्रमोद तिवारी


लखनऊ। केंद्रीय कांग्रेस वर्किंग कमेटी के सदस्य तथा आउटरीच एंड को-ऑर्डिनेशन कमेटी, उत्तर प्रदेश के प्रभारी प्रमोद तिवारी ने कहा है कि आज 70 दिन से अधिक हो गये हैं और 75वें दिन के करीब पहुंच रहा है, इसके बावजूद भी इस कड़कड़ाती ठण्ड में दिल्ली की सड़कों पर आन्दोलनरत किसानों की मांग को न मानते हुये तीनों ‘‘काले कृषि कानून’’ की वापसी पर केन्द्र सरकार नहीं पसीझ रही, और वह चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार की तरह नहीं बल्कि एक ‘‘तानाषाह’’ की तरह निमर्मता और क्रूरता पर अमादा है। किसान हमारा ‘‘अन्नदाता’’ है, और ‘‘धरती का भगवान’’ है। उसके साथ किया जाने वाला यह दुव्र्यवहार जनता तो क्या प्रकृति भी नहीं स्वीकार करेगी। श्री तिवारी ने कहा है कि मेरा सुझाव है कि जब सरकार डेढ़ साल के लिये सार्वजनिक रूप से और 2 साल के लिये किसानों की वार्ता में कृषि कानून को स्थगित करने पर राजी हो गयी है तो क्यों नहीं उसे तब तक के निरस्त कर देती, और जब कोई हल नहीं निकलता है तो नया ‘‘संशोधित कृषि कानून’’ लाते, जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी की गारण्टी हो। क्योंकि आज यह फार्मूला पूरी तरह फेल हो चुका है, जब यह कानून लागू है तो किसान अपना ‘‘धान’’ लगभग रु. 1000- 1100 (हजार- ग्यारह सौ रुपये) में बेंच रहा है जबकि घोषित समर्थन मूल्य रु. 1868 है। श्री तिवारी ने कहा है कि केन्द्र सरकार ने दिल्ली में किसानों के रास्ते में कठोर घेराबन्दी की है, और 12 सतही सुरक्षा की दीवार बनाई है, जिसमें कंटीले तार भी हैं, सीमेण्ट के अवरोध भी हैं, और खाईं भी है, तथा हर तरह के अवरोध है जो न तो कभी देखे गये हैं और न ही सुने गये हैं। यही नहीं किसानों से निपटने के लिये पहली बार लाठी की जगह लोहे के राॅड दिल्ली पुलिस ने खरीदे है। काश! यदि इस तरह की सुरक्षा व्यवस्था ‘‘केन्द्र सरकार’’ भारत की सीमाओं पर करती, और लद्दाख में लगाती तो हजारों किमी. भारत की भूमि पर ‘‘चीन’’ कब्जा नहीं कर पाता, लेकिन वहां पर तो 56 इंची कापने लगते हैं जबकि हमारी ‘‘विश्व विजयी’’ बहादुर सेना में ‘‘दम’’ है, जिसने वर्ष 1971 में दुनिया का इतिहास ही नहीं बल्कि भूगोल बदला है, काश ! यदि वही राजनैतिक इच्छाशक्ति प्रधानमंत्री मोदी जी दिखाते तो आज यह नहीं होता। श्री तिवारी ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि वे किसानों को बुलाकर उनके साथ वार्ता करें, और तीनों ‘‘काले कृषि कानून’’ वापस लें। श्री तिवारी ने कहा है कि मैं नहीं समझता कि आज उत्तर प्रदेश का कोई भी नेता, वह जिस भी राजनैतिक दल का हो वह ‘‘केन्द्रीय बजट’’ का स्वागत कर सकता है जबकि इसमें ग्रामीण विकास में 34ः की कमी की गयी है, इस बजट में उत्तर भारत को प्राथमिकता नहीं मिली है जबकि दक्षिण और पूरब के राज्यों को वरीयता दी गयी है क्योंकि वहां  ‘‘चुनाव’’ होने वाले हैं। इस बजट में खासतौर से उत्तर प्रदेश का जिक्र है जहाँ 2 वर्षो के अन्दर बजट में रु. 63 हजार करोड़ (तिरसठ हजार करोड़ ) केन्द्रीय करों में मिलने वाली धनराशि कम की गयी है। वर्ष 2020-2021 में रु. 42 हजार करोड़ (बयालीस हजार करोड़) की धनराशि कम की गयी है, और वर्ष 2021-22 में भी लगभग रु. 21 हजार करोड़ (इक्कीस हजार करोड़) की हिस्सेदारी वर्ष 2020- 21 की तुलना में कम की गयी है। श्री तिवारी ने कहा है कि यही वह धनराशि है जिससे केन्द्रीय सहायता के रूप में किसी प्रदेश को मिलती है, यह किसी भी प्रदेश का अधिकार है जो केन्द्र, प्रदेश से वसूलता है और प्रदेश को उसके अनुपात के हिसाब से देता है। इस बजट में बढ़ाकर तो कुछ दिया नहीं गया, जो ‘‘गाडगिल फार्मूले’’ के तहत उत्तर प्रदेश का अधिकार था, बल्कि उसमे भी कटौती की। बजट में बेरोजगारी पर कोई सार्थक पहल नहीं की गयी,  अतः बेरोजगारी और अधिक बढ़ेगी। उत्तर प्रदेश के लिये कोई ‘‘विशेष आर्थिक पैजेक’’ नहीं, फिर कैसे इस बजट का स्वागत किया जाय। श्री तिवारी ने कहा है कि इसमें एक चीज और भी खतरनाक है कि रु. 1 लाख 40 हजार करोड़ (एक लाख चालीस हजार करोड़) के विनिवेष की संभावना जताई गयी है, अर्थात देश के किसानों और आम आदमी की कमाई का रु.1 लाख 40 हजार करोड़ (एक लाख चालीस हजार करोड़) फिर से पंूूॅजीपतियों के हवाले की जायेगी। यह अवध में प्रचलित एक कहावत को पूरी तरह चरितार्थ करता है कि‘‘सपूत जोड़ता है- कपूत घर द्वार बेंचकर उड़ाता है’’ आज भारतीय जनता पार्टी की ‘‘केन्द्र सरकार’’ यही कर रही है।