परवानों को चिराग लुभाने लगे हैं

परवानों को चिराग लुभाने लगे हैं

वक्त के स्याह साए गहराने लगे हैं

बिताकर चंद दिन चंद महीने सैलानी

अपने अपने घरों को जाने लगे हैं

सवाल जितने भी खड़े किए समय ने

हर सवाल के जवाब आने लगे हैं

अपने अपने थे पास सबके मंसूबे

सब एक-एक कर के ठिकाने लगे हैं

सबको जाते देख अपने बिस्तरों में

कुछ सपने भी आकर सिढ़ाने लगे हैं

परवाने- कीट पतंगे

स्याह- काले ,साए- परछाई ,

सैलानी- घुमक्कड़, यात्री

मंसूबे- इच्छाएं,

डॉ एम डी सिंह