आत्मिक शांति...!

नरक द्वार में डूबे डूबे,
        ढूंढ रहा जीवन की राह।
खुद बटोही खोज रहा,
        राह पाने स्वर्ग की चाह।
ये प्रकाश में छीपा हुआ,
          दो पक्षों का आयाम।
एक ऊर्जावान से भरा,
        दूजे आभा का नाम।
सर्द मौसम में ऊष्मा का,
        अंधकार से प्रकाश में।
आध्यात्म की ज्योति फैला,
          धरती से आकाश में।
कहाँ कहाँ भटकेगा प्राणी,
      निज पाप लिपटा हास में।
चंदन की खुश्बू ढूंढ़ रहा,
    देख कलियुगी कपास में।
श्रद्धा में शक्ति निहित निहित,
      अंतःकरण व्याप्त सर्वत्र।
माया नगरी में भटक रही,
      सूरज तारे और नक्षत्र।
कामी क्रोधी लोभी पापी,
      तनिक नही कहीं भी लज्जा।
स्वर्ग यही है नरक यहीं।
      छिन्न भिन्न राग की सज्जा।
करता कर्म गुणी सदगुणी,
        सार रस है शांत मन का।
निश्छल हृदय सुख सार जो,
        पावन धरा में स्वर्ग तन का।
करो श्रध्दा उज़ागर,
        खुल जायेगा मार्ग स्वतः।
वरना लिपटे ही रह जाये,
        गहरी माया यथा अतः।
मैं भी तुम भी सब ढूंढ़े,
      छिपे हुए है राज कहाँ।
साधना पथ की चुनौती देने,
    खड़ा हुआ है पथ काँटे जहाँ।
भूखे भटक रहे राहों पर,
      जहाँ दिखे चाह की भ्रांति।
बटोही एक अंश आत्मा से,
  लुटाना अपना आत्मिक शांति।

              दिव्यानंद पटेल
              विद्युत नगर दर्री
              कोरबा छत्तीसगढ़