निर्माण करती है

निर्माण करती है
मनुष्य की अन्त:प्रकृति का
इतना ही नहीं
उसे सतत बदलती भी है
अहम सवाल यह है कि
एक कवि के मन में
सृजन का विचार
कैसे आता है
कैसे करता है वह विषय चयन
क्या आस पास की घटनायें
उसे सच में प्रभावित करती हैं
उसकी काव्य चेतना को
सच में दस्तक देती हैं
उसकी कल्पनाशीलता को
सच में उद्वेलित करती हैं
तो क्या निष्कर्ष निकाला जाये
महज व्यक्तिगत आवेग ही कविता है
महज व्यक्तिगत बोध ही कविता है
तो क्या कविता का कैनवस इतना सीमित है
अगर ऐसा सच में है तो फिर
कविता सार्वभौमिक कैसे हो जाती है
भला किसी एक का वस्तुगत बोध
पूरे समाज का बोध कैसे हो जाता है
शायद यही दर्शन है कविता का
जिसकी अनुभूति कवि को होती है
और वह आत्म संवाद के सहारे
खुद के एहसासों का रिश्ता
बाहरी दुनिया के अस्तित्व से
जोड़ने की पूरजोर कोशिश करता है
और कोशिश की इस प्रक्रिया
अगर वह सफल हो जाता है
तो उसकी कविता
काल से परे हो जाती है
फिर आप चाहें तो
उसके सौंदरबोध पर चर्चा करें
उसके सरंचनावाद पर चर्चा करें
उसके इन्द्रियानुभव पर चर्चा करें
उसके निश्चयातमक्ता पर चर्चा करें
उसकी विषयपरक्ता पर चर्चा करें
सब बेमानी हो जाते हैं
हाँ,यह भी सच है कि कविता
किन्हीं भी परिस्थितियों में
अपने सामाजिक सरोकार
बेशक नहीं छोड़ती

राजेश कुमार सिन्हा
मुंबई