आर्यावर्त के चार स्तंभ

इस गौरव भूमि आर्यावर्त के कुल मिलाकर चार स्तंभ

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इस इस पुण्य भूमि के चार स्तंभ ll

वेद पाठ का ज्ञान फैलाकर ब्राह्मण करते थे अपना कार्य
चमक दिखा तलवार का क्षत्रिय चलाते थे अपना राज ll

वैश्य का वह व्यापार कुशलता व्यापारी उसे बनाया था
शुद्र का वह कार्य कौशल नया समाज बनाया था ll

एक बिना दूजा अधूरा मिलजुलकर बनता था समाज
पनपतिया से लेकर शहनाई बिन ना होता था कोई शुभ कार्य ll

मिलजुलकर समाज की गाड़ी रुके बिना ही चलता था
मान और सम्मान के साथ समाज सतत ही बढ़ता था ll

फिर आया मुगलों का घोड़ा लूट और खसोट लिए
समाज और परिवार को तोडा ऊंच-नीच का भाव दिए ll

ब्राह्मण को बुरा बताया क्षत्रिय वैश्य और शुद्र के बीच
ज्ञानदीप पर आघात किया अपने ही मानस के बीच ll

ज्ञान बिना अंधकार की छाया फैला पूरे भारतवर्ष
आर्यों के गरिमा पर संकट छाया पूरे भारतवर्ष ll

लूटा छीन झपट मारकर आतंक मचाया पूरे आर्यावर्त
आस्था सहित मानस मर्यादा छीना पूरे आर्यावर्त ll

आगे दौड़ शुरू हुआ गोरों का भाई भाई तोड़ दिया
फूट डालकर शासन करते दो सौ वर्ष निकाल दिया ll

फिर लोगों में जागा स्वाभिमान गोरों को खदेड़ दिया
लेकिन उसने नाजायज सोचो को भारत में ही छोड़ दिया ll

अंग्रेज गए इस भारत से बरसों बरस निकल गए
आज भी कुछ गंदी सोचें भारत में है पल रहे ll

हम सनातनी हम हैं हिंदू बुरा नही हम किसी का चाहते
ब्राह्मण सहित चार स्तंभ है अखंड भारत हीं चाहते ll

मीम- भीम का नारा देकर कुछ कुंठित खेल रहा अपना खेल
कम्युनिस्ट का ओट बनाकर कुछ विधर्मी खेल रहा नया खेलll

हम ब्रह्मा के हैं संताने आपस में सब भाई हैं
कोई छोटा या बड़ा सही पर सभी एक ब्रह्म पिता के जाई हैं ll

कर्म हमारा अलग अलग था पर मकसद तो बस एक था
भारतवर्ष की पुण्य भूमि का रक्षा मकसद तो बस एक था ll

अब कहां फंसे इन पचड़ों में आओ मिलकर साथ चले
भाई भाई मिलकर फिर से चार स्तंभ तैयार करें ll 3

श्री कमलेश झा
नगरपारा भागलपुर
बिहार
9990891377