भारतीय संस्कृति, महिलाएं और आधुनिक परिवेश।

भारतीय संस्कृति एक ऐसी प्राचीनतम संस्कृति है जो अनुपम वह उच्च थी सभ्यता की पराकाष्ठा थी जब आधी से ज्यादा दुनिया जंगलों में घुमक्कड़ जीवन यापन करती थी तब भी हम सबवे संस्कृति से सराबोर थे ऐसे संस्कृति जिसमें महिलाएं भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती थी और यह भारतीय नारी की महानता थी। यद्यपि काल के प्रभाव से भारतीय नारियों का प्राचीन आदर्श बहुत कुछ मिट गया है परिवर्तित हो गया है फिर भी साधारण परिवारों से ताल्लुक रखने वाली महिलाएं आज भी प्राचीन संस्कारों के साथ जीती है वह मर जाती हैं आज भी भारतीय नारियों में जितना सत्य त्याग समर्पण का भाव पाया जाता है उतना अन्य किसी भी देश में नहीं है। महिला जिसमें बचपन से ही सुकुमार ता सहनशीलता लज्जा उदारता आदि गुणों का स्वाभाविक समावेश होता है और साथ ही वह साथ ही होती है आत्मसमर्पण की प्रबल भावना जिसमें वह नीलकंठ की तरह नित थोड़ा-थोड़ा विश पीती रहती है क्योंकि जिससे सात फेरों के बंधन में बंध जाती है उसे देवता मानती है क्योंकि उसे सब कुछ समर्पित करवा अर्धांगिनी बनती है जिससे वह अपने दूसरे अंग को अपने से ज्यादा प्रेम करती है परंतु इस चित्र को नहीं मानना पुरुषों की नासमझी होती है। नारी जो अपने संपूर्ण जीवन को उत्सर्ग की ओर ले जाती है उसका आधान भी अवसर आने पर प्रदान के लिए ही होता है संसार में उसका कुछ नहीं होता है जो कुछ भी होता है पति परिवार समाज व देश के लिए होता है आदान के विषय में वह गर्भ धारण करती है पुरुष के वीर्य से शुक्र की कुछ बूंदें ग्रहण करती है मगर अपनी सहस्त्र बूंदों को मिलाकर नई संतति को जन्म देती है जिसे उसके नाम से तक नहीं जाना जाता है यह सब एक महिला के गुण हैं स्वाभाविक कुछ ईश्वर के दिए कुछ अपने और कुछ समाज से मिले हुए। मनु ने धर्म के जो 10 लक्षण बताए हैं धृति क्षमा दमो असते शौच इंद्रिय निग्रह भी विद्या सत्य क्रोध का पालन एक महिला अपने संपूर्ण जीवन में करती है संसार को कोई भी मानव 10 लक्षण संपन्न रूपों का पूर्ण रूप एंड शायरी पालन कर पाता हो परंतु नारी अपने जीवन में इन 10 गुणों का पालन करने का प्रयास करती है नारी और भारतीय नारियों की विशेषताओं से हमारा इतिहास भरा पड़ा है जिसमें 24 नहीं अनगिनत नाम गिनाए जा सकते हैं चाहे वह सफल दांपत्य जीवन हो देशभक्ति हो पतिव्रता धर्म हो शास्त्रार्थ हो या ज्ञान में हो सभी महिलाओं का यह वर्णन नहीं हो सकता है तथापि कुछ महिला हैं जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को मर्यादित संस्कारों से पूर्ण सेट किया है वह इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अपना नाम दर्ज कराया है। भारतीय नारियों में अत्रि ऋषि की पत्नी अनुसूया है जिनके सफल दांपत्य जीवन के लिए देवता भी लालायित रहते थे कहा जाता है कि एक बार तीनों देवियों ब्रह्माणी लक्ष्मी पार्वती ने अनुसुइया की परीक्षा लेनी चाहिए इसके लिए अपने अपने स्वामियों को भी तैयार कर लिया पर शायद थी कि तीनों देवियों व अनुसूया में श्रेष्ठ पतिव्रता कौन है ना करने पर भी नहीं मानी तो मनुष्य केदार पहुंचकर भोजन की याचना इस शर्त के साथ निर्वस्त्र होकर उन्हें दिशा प्रदान करें करते हैं अपनों को शिशु रूप में परिवर्तित कर दिया और फिर मां की तरह उन्हें भोजन कराया त्रिदेव त्रिदेव खोजने को निकली तो तीनों देव शिशु रूप में मां अनुसूया के पास थे अपने स्वरूप में अपनों को भी रूप में परिवर्तित कर सकती थी। दूसरी तपस्विनी नारी थी शान दिल्ली जिसने अपने रुकना पति के आजीवन सेवा कि वह जब पति के प्राण संकट में आए तो छह माह तक सूर्य को भी उदित होने से रोक दिया गर्ग वंशी में वचनों नामक ऋषि की पुत्री वाचकनवी गार्गी है जो महान ज्ञानी थी वह शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को परास्त करती थी या अव्वल के रिसीवर गार्गी के शास्त्र के आपसी संबंधों का संकलन ही बृहदारण्यक उपनिषद है।   मित्र ऋषि की पुत्री मैत्री याद बल्कि ऋषि की दूसरी पत्नी थी जब ऋषि ने गृहस्थाश्रम त्याग तपस्या के लिए जाने से पूर्व अपनी संपत्ति को कात्यायनी व मैत्री में बराबर बांट ना चाहा तो कहते ही नहीं अपने पति की इच्छा को स्वीकार किए लेकिन विदुषी गार्गी ने सांसारिक संपत्ति के स्थान पर पति संज्ञान अर्जुन को प्राथमिकता दी वह पति संग गई वह महान विदुषी महिला बनी। वशिष्ठ ऋषि की पत्नी अरुंधति की गणना आज सप्त ऋषि मंडल में वशिष्ठ के पास की जाती है शबरी जिसका वास्तविक नाम श्रम राधा प्रभु की ऐसी भक्त थी कि संप्रभु को उसकी कुटिया में आकर उसे दर्शन देने पड़े और उसके झूठे बेर भी खाएगी विश्ववारा लोपामुद्रा घोषाल इन रानी देवयानी कुंती माधुरी गांधारी आतरी कौशल्या कई महिलाओं ने अपने उच्च संस्कारित ज्ञान मैं जीवन से श्रेष्ठ उदाहरण हैं यह तो पौराणिक महिलाओं की चर्चा इसके बाद भी कई महिलाएं हैं जिनमें ज्योतिबा फुले सरोजिनी नायडू सुभद्रा कुमारी चौहान मीरा देवी हारी पंडित महिलाएं है। यह भी भारतीय संस्कृति की प्राचीन व आधुनिक महिलाएं जिन्होंने आगे बढ़ने के लिए अपनी योग्यता व कड़े संघर्ष का सहारा लिया है किसी भी तरह का अंग प्रदेश का सहारा नहीं लिया गया है अभी तक हम भारतीय संस्कृति में महिलाओं के बारे में जानते हैं आधुनिक भारतीय महिलाओं के परिवेश के बारे में आज भारतीय महिलाएं पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध वह होड़ में अपने संस्कारों व मर्यादाओं को भूल रही है मैं यह नहीं कह रही हूं कि महिलाओं को आगे नहीं बढ़ना चाहिए आगे बढ़ना है बेशक बहुत आगे बढ़ना है कल्पना की तरह का चुना है बचेंद्री की तरह पहाड़ चढ़ना है महादेवी सी पीर लिखना है सुषमा सी राजनीति करनी है पीटी उषा दौड़ना है लता सा गाना है स्मिता सा अभिनय करना है मिरासी भक्ति करनी है मारो सप्रेम करना है मगर मर्यादित व संस्कारों में रहकर करना है आगे बढ़ना सबको तुम्हें भी मुझे भी सभी को लेकिन आगे मेहनत व संघर्ष करके मर्यादा के साथ बढ़ना चाहिए हम फिल्मी दुनिया से प्रभावित होकर फिल्मी नायकों की तरह अपनी वेशभूषा को बदलते जा रहे हैं सुंदर दिखने की चाह में प्रदर्शन करना कहां तक सही है मर्यादित वह संस्कारित वेशभूषा में भी सुंदर दिखा जा सकता है बल्कि पारंपरिक पहनावे में ज्यादा सुंदर लग जा सकता है और महिलाओं के द्वारा कही जाती है पारंपरिक परिधान सुविधाजनक बताती है उन्हें महिलाओं को कहना चाहती हूं कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई संपूर्ण भारतीय परिधान वह पीछे बच्चे को बांधकर युद्ध भूमि में युद्ध करती थी और इस कार्य में बाधक नहीं बनते थे अपनों के लिए किसी परिधान को सुविधाजनक या पुरातन कहना उचित नहीं है प्रभावित होकर महिलाएं प्रदर्शन करती है उन्हें यह समझना चाहिए कि हीरोइनों को उस काम के लिए पैसे मिलते हैं वह उनका काम है और लड़कियां व महिलाएं देखा देखी करती हैं जो उचित नहीं है हमारे भारतीय पर्यावरण के आधार पर हमारा पहनावा है और हम पश्चिमी अंधानुकरण में लगे हैं मैं यहां सिर्फ इतना कहना चाहती हूं कि हमारी सभ्यता संस्कृति सबसे सर्वश्रेष्ठ प्राचीन है तो आधुनिकता अपनाएं मगर मर्यादित आगे बढ़ने के लिए डिस्को पब में जाना नशा करना और घूमना हमारी सभ्यता नहीं है हमें अपनी संस्कृति व सभ्यता पर गर्व होना चाहिए और संपूर्ण विश्व में भारतीय नारी की गरिमा है उसको वैसा ही उदाहरण समाज में पेश करना चाहिए मैं सभी महिलाओं से कहना चाहती हूं कि आधुनिक विचार रखें और संस्कारों में बने रहें और आगे बढ़े पर मर्यादा में भी रहे आसमान में उड़े पर जमीन पर रखें और एक लेखिका के साथ-साथ महिला भी हूं और महिला होते हुए भी मैं ऐसे बसों का विरोध करती हूं चाहे उन्हें आधुनिकता के नाम पर ही कोई आधुनिक नहीं हो जाता है शरीर का प्रदर्शन करना उचित नहीं है और किसी में नहीं और ना ही सुंदरता है तो पशु पक्षियों को ज्यादा सुंदर होना चाहिए पर ऐसा नहीं है आधुनिकता की आड़ में अपने संस्कार नहीं भूले आगे बढ़े लेकिन सीएम की राशि की गरिमा को बढ़ाते हुए आगे बढ़े।  

कवयित्री:-गरिमा राकेश गौतम
पता:-कोटा राजस्थान