चल रहा था ज़िक्र बेवफ़ाई का ।

सखियों ने जो तेरी पूछा तो बताना पड़ा मुझे ।
कई थे खत तेरे पास मेरे दिखाना पड़ा मुझे ।
रहगुज़र पर दिल की उसका था आना जाना।
न जाने क्यों फि़र ज़मीन पर आना पड़ा मुझे ।
अफ़साने के किरदार वजूद जिनका नहीं रहा।
मंज़र करके वो ही याद तन्हा रोना पड़ा मुझे ।
बेवफ़ाई का सितम हां कब तलक सहा जाता ।
शहर से उसके दूर बहुत दूर जाना पड़ा मुझे।
बज़्म में रात चल रहा था ज़िक्र बेवफ़ाई का ।
नाम "मुश्ताक" तेरा भी फि़र बताना पड़ा मुझे ।

डॉ़. मुश्ताक अहमद शाह "सहज"