क्या ये इश्वर का मज़ाक नहीं

इश्वर जिसने सारा जहां बनाया,  प्राकृति बनाई , मनुष्य के लिए  हर सुख-सुविधा प्रदान की, जिसे हम मानते हैं कि इश्वर सर्वोपरि है, कण-कण में विराजमान हैं ईश्वर, हमारे हर पल की खबर रखता है ईश्वर, इश्वर में आस्था रखते हुए भी, हम इश्वर का निरादर कर रहे हैं। 

इश्वर को मात्र एक सजावट की वस्तु बना कर के रख दिया है इन्सान ने, कभी गणेश विसर्जन के नाम पर ढेरों अनगिनत मुर्तियां बनाई जाती है जो बेची और खरीदी जाती है, बेचना और खरीदना तो एक व्यपिर है, और हर इन्सान अपने तरीके या सुरूचि का व्यापार  करता है, मगर फिर उन्हें विसर्जन के नाम पर कूड़े की तरह नदियों में ढेरों के ढेर बहा दी जाती है, आस्था तक तो ठीक है लेकिन केवल होड़ में एक दूसरे से बड़ी मूर्ति लाना और देखा-देखी सब का ही इस तरह की दौड़ में शामिल होना ना केवल पैसे की बर्बादी है अपितु इश्वर का भी अपमान है। 

कभी कोई अपने प्रोडक्ट की बिक्री के लिए भी ईश्वर का इस्तेमाल करने लगे हैं अपने प्रोडक्ट पर ईश्वर की तस्वीर छाप देना कहां की अक्लमंदी है, जब हम उस प्रोडक्ट या वस्तु का उपयोग करेंगे तो उसका कवर अर्थात उपरी आवरण कूड़े में नहीं फेंकेंगे? कभी पटाखों पर ईश्वर की या मां लक्ष्मी की तस्वीर। 

एक तरफ तो दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है और दूसरी तरफ उसी मां लक्ष्मी की पटाखों पर बनी तस्वीर पटाखों के साथ जला दी जाती है।  ये कैसी आस्था है इन्सान की ?  कहीं चप्पल की बिक्री बढ़ाने के लिए उस पर भी इश्वर की तस्वीर लगा दी जाती है। जिस इश्वर की आप पूजा करते हो उसी को पैरों में चप्पल पर चिपकाया जाता है।

#वाह रे इन्सान तेरी फितरत, तेरा कैसा है ये रूप,

कभी कहे ठंडी छांव इश्वर को कभी कहे तपती धूप#

कभी उस ईश्वर को हम लाकेट बना कर गले डाल कर घूमते हैं, और कभी कार में पवनसुत को लटकाया जाता है, कभी चाबी के छल्ले में हम ईश्वर की बनी मुर्ति बांध लेते हैं। कभी कपड़ों पर इश्वर की तस्वीरें, ये हमारी कैसी आस्था है ईश्वर के प्रति ? 

अगर हमें सबकुछ मिला तो ठीक ईश्वर तेरी कृपा है, कहीं कुछ कमी रह जाए तो ईश्वर निर्दयी है, क्यों इतना हमें सताता है, हम पर दया नहीं करता ईश्वर। क्या ईश्वर हमारे हाथों की कठपुतली है या हमारा कोई अलादीन के चिराग वाला जिन्न जो हमारी हर बात झट से पूरी करता रहे, और हमारे इशारे पर चलता रहे। 

       क्या ये इश्वर का मज़ाक नहीं ?

अगर ईश्वर में आस्था है तो उसका मज़ाक क्यों?

मौलिक एवं स्वरचित

प्रेम बजाज, जगाधरी ( यमुनानगर)