॥ त्रृतुराज ॥

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
बतंत में घर की चमन सजा दो
बीणा वादिनी हंस पे सवार हाे आई
ज्ञान की सौगात जग में है बरसाई

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
गुलशन की बगिया महकाओ
पतझड़ ने बहुत है चमन को रूलाया
डाली से पत्ते तक है झड़ आया

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
तरू पे नव पल्लव को सजा दो
मदमस्त बहार फिजां में बह जाये
पावन होली रंग की बरसात बरसा जाये

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
अमुआँ की डाली पे मंजरी को सजा दो
पपीहा मस्ती में प्रेम गीत गाये
कोयलिया विरह की दलदल से निकल जाये

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
उदास कलियों की नव जीवन दे जाओ
चमन में बेला चमेली खिल जाये
पुष्पराज गुलाब भी मुस्कुराये

ओ त्रृतुराज बसंत मेरे घर आओ
नई विहान की नव रवि दिखलाओ
उषा की लाली जग को चमकाये
जीवन में खुशियॉ वापस ना जा पाये।

उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार