बने हम पांच दस के

बने हम पांच दस
बीस पचचीस के सिक्के
काफी जमाना रहा हमारा
ऊब गए तो कर दिया किनारा
बड़े-बड़े आंकड़ों में तो
आ जाते हैं हम
रुपए से हो चला
रिश्ता पुराना हमारा
क्या रे तेरी खुदाई
न बनाया हमें इंसा
आवादी बनती बहाना
न होती हमें रिक्तियाँ
अच्छा हुआ न बने
हम आधुनिक नेता
बार-बार बदलनी पड़तीं
वस्त्रों की तरह पार्टियां
अच्छा नहीं बने मानव
मुश्किल होती होते जो यदि दानव
पर अरबों में भी रहेगा अस्तित्व
कितना भी कोई जाए भूल
बने हम पांच दस
बीस पचचीस के सिक्के

पूनम पाठक