॥ख्वाबों की दरख्त ॥

मन की ऑगन में सुन्दर एक
ख्वाबो की कोमल पेड़ लगा दो
सुबह शाम अपने हाथों से
ठंड़ा ठंडा नीर बरसा दो
फूल खिलेगा दरख्त से हजारों टन
भर जायेगा खुशी से सपनों का तेरा मन

संतोष की दरख्त सबसे है निराला
दिन रात देता मन को उजाला
ना किसी से बैर ना द्वेष
ना चोरी का कोई भी कलेष

मन को भाये ख्वाबों का दरख्त
नहीं अधिक मिहनत की जरूरत
मन के एक कोने में इसे उगाओ
जीवन में आनन्द ही आनन्द पाओ

ख्वाबों का दरख्त है जीवन खुश दाता
रंग विरंगा है फूल उपजाता
देख ख्वाब पल में अमीर बन जाये
कोई फकीर नजर नहीं आये

ख्वाबो की दरख्त मन की आँगन में लगाओ
सपनों की तिजोरी भर घर ले जाओ
ना चोरी डकैती का कोई डर दिखलाये
संतोष धन से मन हर दम भर जाये।

रचना - उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार
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