छप्पर से झांकता चांद

बहुत दिनों से टूटा छप्पर
माघ में है लगे डराए
बहती बर्फ जैसी हवा
दे समूचा बदन सिहराय

टूटे छप्पर से झांकता चांद
तनिक ना मन को भाए
ज्यो त्यो कट जाए माघ
तो शायद जीवित बच जाए

बहुत दिनों से सुना चूल्हा
अब तो लगा अकुलाए
बच्चों के पिचके गालों पे
उसे दया भी आए

आज थोड़ा उठा है धुआ
पतीली भी दिया चढ़ाए
सूनी आंखें एकटक निहारे
उसमें तंदुल उबलाए

काना कुत्ता भी मुस्तैद
कौवा डरेर पे पाख खुजाए
क्षुधा अग्नि आज बुझेगी
सोचे ये मन हर्षाए

रेखा शाह आरबी
यूपी जिला बलिया