"मधुर मिलन की आस"

मधुर मिलन की आस लिए,
मधुमास की राह निहार रही|
कभी कलियों में कभी गलियों में,
ऋतुराज तुझे मैं पुकार रही |
है लालायित मेरी आंखें,
तेरा मनमोहक छवि पाने को|
भेजा है संदेशा कोयल से,
ऋतुराज जी तुझे बुलाने को|
आमों में बौर बन कर आओ !
खेतों में सरसों की कलियां|
धनिया की खुशबू से भर दो!
ऋतुराज सुहानी सी गलियां|
बसंती बयार की ले फुहार,
जीवन को अब महाका जाओ!
यह "रीत" पुकारे हे! बसंत,
तरसाओ ना अब आ जाओ!

स्वरचित, अप्रकाशित एवं मौलिक रचना
लेखिका/ रचनाकार :रीता तिवारी "रीत"