व्यंग के सोपान से

देखकर हैरान हैं सब,
घटते मुखिया जी के भाव से।
कहने लगे ओटर सपोर्टर,
सीना ताने ताव‌ से।।
स्वार्थ अपना साधने को,
मंदिरों में सिर झुकाते।
फूल और माला के संग,
मिष्ठान भी है खूब चढ़ाते।।
    कटने को‌ बेताब चांदी,
    जब‌ मिंयां प्रधान होगा।
    ताल तलैया नदी ईनार,
  सब कुछ अपने नाम होगा।।
चौपाल का रुतबा बढ़ेगा,
फैसला झकास होगा।
गांव में अशांति का सुरक्षित,
अधिकार अपने पास होगा।।
  हर रोज मंगही पान कटेगा,
  दुश्मन का चालान कटेगा।।
  कूटनीति के वैनर तले,
  सुबह शाम ईमान बंटेगा।। दीन‌ दुखी दरवाजे आकर,
जब अपनी‌ व्यथा सुनाएंगे।
धौंस जमाकर मुखिया ज
पैसा खूब कमाएंगे।।
  पटरानी बनकर बीबी,
  धानी चुनर लहराएगी।
शाहजहां के नाम पर आर्डर,
,नूरजहां फरमाएगी।।
व्यग्र मन है कहरहा सातवें आसमान से।
चाहते हैं जीवन जीना,
मुखिया जी भी शान से।
करनें लगे हैं सब छलावा,
विश्वास से हटकर अलग,
सोचिए लेकर आए सरस।
व्यंग के‌ सोपान‌ से।

-गौरीशंकर पांडेय'सरस।