"क्या खूबसूरती ही परिभाषा है एक संपूर्ण स्त्री की"


"क्या खूबसूरती ही परिभाषा है एक संपूर्ण स्त्री की" 

या अदाअें, या फिर उसकी वाकछटा ?

जी नहीं स्त्री को उनकी बुध्दिमता सुंदर बनाती है, झांसी की रानी की सुंदरता की तारीफ़ नहीं होती उसकी साहसिक वृत्ति से महान बनी, इंदिरा गाँधी की बुद्धिमत्ता प्रख्यात है। मर्दों ने हंमेशा स्त्री को एक स्टेप नीचे ही देखा, क्यूँ कुछ मर्द समझते है की औरतों को सारी बात नहीं बतानी चाहीये जैसे की बेंक बेलेन्स, प्रोपर्टी, या फिर मेडिक्लेम। अरे मुसीबत कभी बताकर नहीं आती, मानों की मर्द को अचानक कुछ हुआ तो पत्नी को कैसे पता चलेगा की कौनसी होस्पीटल ले जाना है ,बीमा केसलेस है या नहीं ,बैंक से पैसे कैसे निकालने है, कौनसी  बैंक मे खाता है, कौनसी बैंक में लोकर है, ATM का पासवर्ड क्या है ?

मैंने बहोत सी ऐसी पढ़ी लिखी औरतें भी देखी जो ये सब नहीं जानती, अगर सच में पत्नी को अर्धांगिनी मानते हो,तो ये सारी बातें शेयर करें ताकि मुसीबत आने पर स्त्री को ये सारी जानकारी मददरुप  बनें। मैंने देखा है अचानक पति की मृत्यु होने पर कई सालों तक कुछ लोकर्स बंद पड़े रहते है कुछ अकाउन्ट सालों तक पडे रहते है बिना कोई वहीवट हुए।

आप जितना ध्यान तन की खूबसूरती पर देते हो उतना ही बुध्दि चातुर्य पर भी दे, इन सारी बातों की जानकारी रखें।

न्यूसपेपर्स की हेडलाइन जरुर देखें 

एक सीरियल कम देखें और देश दुनिया में क्या चल रहा है ये जाने ताकि कहीं किसी बात की चर्चा हो रही हो तो आप बेबाक इस इश्यूज़ पर अपना मत ज़ाहिर कर सके।

किटी पार्टीस में एक गेइम कम खेलें और उसकी जगह देश में चल रहे किसी करन्ट टोपिक पर चर्चा करें। सुंदरता के साथ ये सारी बातें भी अपनाईये तभी एक संपूर्ण नारी उभर आएगी।

21वी सदी की कुछ नारीयाँ भी क्यूँ मौका देती है खुद के विमर्श में पन्ने भर-भर के हर कोई उनकी बेचारगी लिखते रहें एक दायरे में  बँधी ज़्यादातर स्त्रीयाँ परिस्थितियों को बदलने के लिए लड़ती ही नहीं। परिस्थितियों के साथ वो कितनी मेहनत से एडजस्ट कर रही है वो बात सिर्फ़ अपने पति तक पहूँचे उतना ही चाहती है। फिर उसके पति को परवाह हो या ना हो। क्यूूँ अपनी पीड़ा ज़ाहिर नहीं करती क्यूँ सहने की आदी बन जाती है। खुद के लिए रिस्पेक्ट खड़ा करना चाहती ही नहीं बस बेचारगी चेहरे पर चढ़ाए फिरती है, घर में अगर कोई परेशानी है तो पति को बताना उचित नहीं समझती, अंदर ही अंदर दु:खी होते सोचती रहती है कोई तो मुझे पूछे की क्या परेशानी है। अरे आप खुद चिल्ला-चिल्ला कर बोलो ना घुट-घुट  कर मरने में कौन सी महानता दिखानी है।

जब पढ़ी लिखी हर बात में काबिल स्त्रीयाँ खराब परिस्थितियों को अपना लेती है तब लगता है ये विमर्श जो सदियों से चला आ रहा है ये उसी के लायक है।

जब कोई तुमको ना समझे तब हथियार मत डाल दो, अपने अस्तित्व को ख़ुमारी से उभारो खुद को स्थापित करो एक सन्मानजनक परिस्थिति के लिए।

देखा है मैंने कुछ औरतों को घर के बुजुर्गो से लेकर बच्चों के हाथों ज़लिल होते हुए, ना बहू के रुप में सम्मान मिलता है, ना पति के मुँह से तारिफ़ के दो शब्द सुनने को मिलते है, ना बच्चे माँ की गरिमा को इज्ज़त देते है।

तुम कुछ नहीं जानती, तुझे कुछ नहीं आता, या तुम तो रहने ही दो एसे तानों से एक स्त्री को कभी उपर उठने ही नहीं देते और वो खुद को तुच्छ समझने लगती है। कोई ये क्यूँ नहीं समझता की स्त्री घर की नींव है जितनी समझ उसमें है उतना केलीबर किसी में नहीं। 

पर अपना मान सन्मान और अपनी एक विशेष पहचान बनाना अपने ही हाथों में है। एडजस्टमेंट और सहनशीलता की मूर्ति मत बनें रहे, दिल के दर्द को वाचा दीजिए। परिस्थितियों को सबके सामने रखकर हल ढूँढिये और अपने लिए एक सुखमय ज़िंदगी की राह चुनिये।

एक बात हर स्त्री को याद रखनी चाहिए की वो है तो मकान घर बनता है, वो है तो पति घर के प्रति निश्चिंत होता है, वो है तो बुज़ुर्गों को दो टाइम समय पर खाना मिलता है, वो है तो बच्चों की हर जरूरतें पूरी होती है। आप समुन्दर की बूँद नहीं पूरा समुन्दर हो। चार दिन बाहर जाती है स्त्री तो घर की क्या हालत हो जाती है ये बात सब जानते है। तो अपने आप को गृहिणी नहीं घर की रानी समझो और खुद में इतना आत्मविश्वास जगाओ की दो बातें फ़ालतू की सुनाने से पहले हर कोई दो बार सोचे। एक मंत्र याद रखो "कुछ तो करो यूँही घुट-घुट कर मत मरो" hey lady u r the boss 

कह दो अब स्त्री विमर्श में लिखने वालों को कि अपने समय और कागज़ की फ़िज़ूल खर्ची ना करें, आज की नारी ना लाचार है, ना कमज़ोर है, ना बेचारी है, अपने आप में खुद्दारी की एक मिसाल है।

कब देखने को मिलेगा यातनाओं से उभरी स्त्रीओं से बसा उज्जवल समाज उस दिन में लिखूँगी "स्त्री एक वंदना" 

नहीं लगता अब चुटकी भर मुखर होना चाहिये कुछ अबलाओं को,

जो मौन की कगार पे खड़ी सबकुछ झेलने को तत्पर रहती है। किसने हक़ दिया उन मर्दों को जो जूती समझते है अपने साथ जुड़ी हर औरतों को, सादगी शृंगार है माना पर बेड़ी बनाने में साथ क्यूँ देना। शादी का बंधन जीवन की जरुरत सही पर बँधन को बंदीश का नाम देना कितना उचित है। सिंदूर को मान दो,

सरताज तुम्हारे जीवन की लगाम थामें जल्लाद बनकर जिस दिशा में घुमाए मत घूमो खुद की भी परिधि तय करो।

वो तो चाहता ही यही है की तुम दबी रहो मौन, ज़िंदगी के कमरे के एक अंधियारे कोने में, अरे उखाड़ फैंको हर बंदीगृह से उनके अलिगढी तालों को मुक्त विहंग सी उड़ो ना असीम आसमान को भरने अपनी परवाज़ में। सिर्फ़ सारी सूट ही जँचता नहीं, बेकलेस जिन्स में भी सदाबहार है तुम्हारा हुश्न। लिपिस्टिक को बनाकर गरिमा हिल पहनकर इतराओ!शोभा सबकी तुमसे है तुम हो तो हर ब्रांड नभती है। ना कहना कब सीखोगी आधी दफ़न तो हो गई क्या पूरा समर्पित होना है।

हक़ को छीनने को विद्रोह नहीं हिम्मत कहते है कर लो जीते जी हिम्मत,

फगाकर देखो उनकी प्रताड़ना। सच में मोक्ष दे दो हनन सहने की वृत्ति को, मुक्ति का अहसास तुम्हारी उम्र में २० साल का इज़ाफ़ा करेगा।

(भावना ठाकर, बेंगुलूरु)#भावु